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Delhi NCR News: छोटे ढाबों पर लौटा लकड़ी का चूल्हा, आग के साथ धुएं में पक रहा खाना

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Apr 2026 08:23 PM IST
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--सिलेंडर की किल्लत से छोटे कारोबारियों की बढ़ी मुश्किलें, ब्लैक में महंगा गैस; कमाई घटी, लागत बढ़ी
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सनी सिंह
नई दिल्ली। दिल्ली में गहराते गैस संकट ने अब छोटे ढाबों और रेहड़ी-पटरी पर खाना बेचने वालों की रोजी-रोटी पर सीधा असर डाला है। पहले जहां एलपीजी सिलेंडर की नीली लौ पर दाल-रोटी पकती थी, वहां लकड़ी और कोयले के चूल्हे जल रहे हैं। धुएं के बीच खाना बनाना मजबूरी बन गया है और बढ़ती लागत ने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है।

आउटर रिंग रोड सीमापुरी में सड़क किनारे ढाबा चलाने वाले बृजेश ने बताया कि पिछले कई दिनों से गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिल रहा है। एजेंसी जाने पर स्टॉक खत्म होने की बात कही जाती है। मजबूरी में लकड़ी का चूल्हा जलाना पड़ रहा है। पहले एक सिलेंडर से कई दिन काम चलता था लेकिन अब रोज लकड़ी खरीदनी पड़ती है जिससे खर्च बढ़ा और मुनाफा घटा है।
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भजनपुरा में ठेला लगाकर खाना बेचने वाले सोनू ने कहा कि बाजार में गैस ब्लैक में मिल रही है जिसकी कीमत 3000 से ज्यादा है। जो छोटे दुकानदारों के लिए बहुत महंगा है। सिलेंडर खरीदने पर खाने का रेट बढ़ाना पड़ेगा, जो हर कोई ग्राहक नहीं दे पाएगा। ऐसे में लकड़ी और कोयले का सहारा लेना पड़ रहा है। धुएं में काम करने से आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी होती है।
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सीलमपुर के ढाबा संचालक मो. रसीद का कहना है कि गैस कमी का असर ग्राहकों की संख्या पर भी पड़ा है। लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनने में समय ज्यादा लगता है, ग्राहक इंतजार नहीं कर पाते और दूसरे जगहों पर चले जाते हैं। अब आधी कमाई भी मुश्किल हो गई है।
करावल नगर में चाय और पराठा बेचने वाले आलोक तिवारी बताते हैं कि गैस संकट ने छोटे ढाबों को पुराने दौर में धकेल दिया है। लकड़ी के चूल्हे पर काम करना मुश्किल है, साथ ही धुएं और गर्मी के कारण स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। अगर जल्द गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो छोटे ढाबे बंद हो सकते हैं।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि गैस संकट का ज्यादा असर गरीब और छोटे कारोबारियों पर पड़ रहा है। बड़े होटल और रेस्टोरेंट किसी तरह सिलेंडर का इंतजाम कर लेते हैं लेकिन छोटे ढाबे वालों के पास सीमित संसाधन हैं। ऐसे में प्रशासन और आपूर्ति विभाग से गैस की नियमित आपूर्ति करने की मांग तेज हो गई है।
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