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कैबिनेट बनाने में केजरीवाल ने तोड़ी एक और परंपरा

Sat, 14 Feb 2015 08:06 PM IST
Updated Sat, 14 Feb 2015 08:06 PM IST
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without Sikh and woman minister Kejriwal broke another tradition

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में गठित आम आदमी पार्टी की दूसरी सरकार में महिलाओं और सिखों का प्रतिनिधित्व न होने को लेकर केजरीवाल ने एक और परंपरा को तोड़ा है, जबकि आम आदमी पार्टी विधायक दल में महिलाओं और सिखों की पर्याप्त संख्या है। आने वाले भविष्य में हो सकता है कि विपक्ष इस मामले को बड़ा मुद्दा बना ले।

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केजरीवाल की पहली सरकार में महिला और दलित दोनों के प्रतिनिधि के रूप में राखी बिड़लान को जगह मिली थी और विधानसभा अध्यक्ष पद सिख को दिया गया था, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए।
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1993 में जब दिल्ली में विधानसभा का दोबारा गठन हुआ और चुनावों के बाद मदनलाल खुराना केनेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तब उसमें पूर्णिमा सेठी को मंत्री बनाया गया और भाजपा के सिख नेता रहे हरशरण सिंह बल्ली भी मंत्री बने।
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मंत्रिमंडल में सिक्खों और महिलाओं का रहा है वर्चस्व

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हवाला कांड के चक्कर में खुराना के इस्तीफे के बाद भी इन दोनों को मंत्रिमंडल में जगह मिली। 1998 में जब शीला दीक्षित केनेतृत्व में पहली सरकार बनी तब महिला मुख्यमंत्री होने केबावजूद शीला दीक्षित मंत्रिमंडल में कृष्णा तीरथ को जगह मिली और तीरथ तबतक मंत्री रहीं जब वह 2004 में लोकसभा के लिए चुनी गईं।

इसके बाद किरण वालिया लगातार मंत्री रहीं । इसी तरह सिखों को  प्रतिनिधित्व देने केलिए कांग्रेस सरकार में अरविंदर सिंह लवली मंत्री बनाए गए। भाजपा सरकार में जहां महिला और सिख के साथ दलित नेता एसपी रातावाल मंत्री बने वहीं शीला सरकार में दलितों की नुमाइंदगी पहले कृष्णा तीरथ और बाद में राजकुमार चौहान ने की।

भाजपा सरकार में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं था, क्योंकि भाजपा के पास कोई मुस्लिम विधायक ही नहीं था। जबकि शीला दीक्षित की तीनों सरकारों में मुसलमानों को नुमाइंदगी दी गई। परवेज हाशमी और हारुन युसुफ को मंत्री बनाया गया, वहीं आम आदमी पार्टी की पिछली सरकार में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं था, जबकि इस बार महिला और सिखों का कोई प्रतिनिधि नहीं।

नए मंत्रिमंडल के साथ दावा नई राजनीति का

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बताया जा रहा है कि किसी महिला विधायक को विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाया जा सकता है। लेकिन उपाध्यक्ष की भूमिका सिर्फ सदन चलाने में विधानसभा अध्यक्ष के साथ सहयोग करने तक ही सीमित है। जबकि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा बेहद अहम है और आम आदमी पार्टी ने इसे चुनावों में अपना प्रमुख मुद्दा भी बनाया था।

कांग्रेस से आप में शामिल हुईं अलका लांबा चांदनी चौक से विधायक चुनी गई हैं, लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली । आम आदमी पार्टी के नेताओं का तर्क है कि आप प्रतीकात्मक राजनीति में नहीं काम करने में विश्वास रखती है। लेकिन सरकार में विभिन्न वर्गों की हिस्सेदारी इसलिए भी जरूरी है कि उन वर्गों की समस्याओं और मुद्दों को बेहदर तरीके से उनके नुमाइंदे ही रख सकते हैं।

हालाकि अभी आप को मिले बुलडोजरी बहुमत की वजह से विपक्ष चुप है, लेकिन जल्दी ही भाजपा और कांग्रेस इसे मुद्दा बना सकते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान जब आम आदमी पार्टी छोड़कर शाजिया इल्मी भाजपा में गई थीं, तो उन्होंने आप नेतृत्व पर पुरुषवादी होने और महिलाओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाया था। भाजपा ने मुख्यमंत्री की उम्मीदवार किरण बेदी को आगे करके महिलाओं का भरोसा जीतने की कोशिश की थी, लेकिन कामयाब नहीं रही।

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