{"_id":"4ef0efc8ae755c3db324d301472561fc","slug":"why-faridabad-is-not-getting-industry-in-town","type":"story","status":"publish","title_hn":"औद्योगिक नगरी में क्यों नहीं लग रहे हैं उद्योग?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
औद्योगिक नगरी में क्यों नहीं लग रहे हैं उद्योग?
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Mon, 05 May 2014 06:16 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फरीदाबाद नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लॉनिंग विभाग और खुद की एक छोटी सी गलती इस समय एनआईटी औद्योगिक क्षेत्र में चलने वाले सैकड़ों उद्योगों के लिए बड़ा दर्द बन गई है। यह दर्द है अवैध सब-डिवीजन यानी बड़े प्लॉटों को छोटे में बदलने का।
विज्ञापन
जिसकी दवा खोजने के लिए उद्योगपति राजनीतिज्ञाें से लेकर अदालत तक का दरवाजा खटखटा रहे हैं। अप्रूव्ड औद्योगिक एरिया में बड़े प्लॉटों का सब-डिवीजन अवैध होने से उद्योग सांसत में हैं। दरअसल, आजादी के बाद भारत-पाक बंटवारे की त्रासदी झेलकर आए लोगों के लिए यहां 1950 और उसके बाद प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अगुवाई में औद्योगीकरण की नींव रखी गई।
विज्ञापन
केंद्र सरकार ने लोगों को रोजगार देने के लिए यहां बड़ी-बड़ी कंपनियों की स्थापना की। लेकिन 60-70 और उसके आगे के दशक में जैसे इस शहर को किसी की नजर लग गई और एक-एक कर बड़े उद्योग किसी न किसी कारण से बंद होते गए। जिसके बाद हजारों श्रमिक बेरोजगार हुए।
विज्ञापन
जब ये उद्योग खुले थे तो सरकार ने उन्हें कौड़ियों के भाव जमीन दी थी। लेकिन जब बंद हुए तो जमीन बेशकीमती हो गई थी। जिसे इसके मालिकों ने प्लॉटिंग करके बेचकर फायदा कमाया। अब एक-एक बड़े उद्योग की जमीन पर कई छोटे उद्योग खुल गए। लेकिन जब बड़े प्लॉटों की अवैध रूप से छोटे-छोटे प्लॉटों में बदलने का काम चल रहा था तो किसी ने नगर निगम या टाउन एंड कंट्री प्लॉनिंग विभाग जैसी किसी सरकार एजेंसी से इसकी अनुमति नहीं ली। यही गलती इस समय सैकड़ों उद्योगों के गले की फांस बन गई है।
40 बड़े उद्योगों की जमीन पर खुलीं 850 फैक्ट्रियां
-एनआईटी औद्योगिक एरिया में इस समय बंद हो चुके 40 बड़े उद्योगों की जगह पर 850 छोटे उद्योग चल रहे हैं। सब-डिवीजन को गैर कानूनी बताते हुए 2007 में आरटीआई कार्यकर्ता केएल गेरा ने हाईकोर्ट में याचिका डाली। गेरा के मुताबिक दिसंबर 2008 में कोर्ट ने सब-डिवीजन को अवैध माना था।
अब इस साल 4 अप्रैल को कोर्ट ने नगर निगम को अवैध सब-डिवीजन के खिलाफ कार्रवाई करने के आदेश दिए। जिसके बाद नगर निगम ने अपने रिकार्ड के मुताबिक 603 उद्योगों को नोटिस देकर उन्हें बंद करने या तोड़ने के आदेश जारी किए। इस मामले को लेकर पूरे औद्योगिक क्षेत्र में हड़कंप मचा हुआ है।
सुरेश अग्रवाल नामक उद्योगपति ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली। उसके बाद मामला हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया गया है। जहां से अग्रवाल को स्टे मिला है। इस मामले की सुनवाई 20 मई को होनी है। इसी को आधार बनाकर अन्य उद्योगपति भी बचने का रास्ता खोज रहे हैं।
तब कहां था नगर निगम, कैसे हो गई रजिस्ट्री
मेन्यूफेक्चरर एसोएिशन फरीदाबाद के महासचिव रमणीक प्रभाकर का कहना है कि यह स्टे सभी उद्योगों को राहत देगा। उन्होंने सवाल किया है कि जब यह सब-डिवीजन हो रहे थे तो नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लॉनिंग विभाग के लोग कहां थे। तहसीलदार कहां सोए थे जिन्होंने यह नहीं बताया कि सब-डिवीजन की रजिस्ट्री नहीं होगी। उस समय आईएमटी नहीं था इसलिए छोटे उद्योग यहीं पर बसे।
चुनाव नजदीक, अब क्या कर रही है सरकार
उद्योगों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने अवैध सब-डिवीजन रेगुलर करने को एक पॉलिसी ड्रॉफ्ट की है। इसी बावत नगर निगम एक सर्वे कर रहा है। इसे मंजूरी देने का काम टाउन एंड कंट्री प्लॉनिंग विभाग करेगा।
यह मुद्दा राजनीतिक भी बन गया है क्योंकि शहर के विधायकों, मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक को मामले की जानकारी है। उद्योगपतियों का कहना है कि पॉलिसी में जो जहां जैसे है उसे अप्रूव्ड करने की बात कही गई है। साथ ही एफएआर (फ्लोर एरिश रेश्यो) 75 से बढ़ाकर 125 फीसदी करने का प्रस्ताव है।
मुख्य उद्योग जो बंद हो गए
ईस्ट इंडिया कॉटन मिल, मेटल बॉक्स, हितकारी पोटरी, झलानी टूल्स, आयशर ट्रैक्टर्स, हिंदुस्तान वैक्यूम ग्लास, ढांढा इंडस्ट्रीज, लक्ष्मी रतन इंडस्ट्री, पेपर मिल, भारत कार्बन, वेयरवेल साइकिल इंडस्ट्रीज एवं इंडियन हार्डवेयर इंडस्ट्रीज आदि।
मुनाफा कमाने के लालच में बेची गईं जमीन: याचिकाकर्ता
सब-डिवीजन के खिलाफ याचिका डालने वाले केएल गेरा का कहना है कि जिन उद्योगों को कौड़ियों के भाव जमीन मिली थी उन्होंने महंगे दाम पर छोटे प्लॉट बेचे। उन्होंने जमीन बेचकर मुनाफा कमाने के लालच में ऐसा किया। इससे हजारों लोग बेरोजगार हुए। जो उद्योग इस समय खुले हैं वह 500 से गज से नीचे भी हैं, जिसमें श्रमिकों की सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है। अच्छा होता कि सरकार बड़े उद्योगों से सस्ते में जमीन वापस लेकर फिर कम से कम एक-एक एकड़ के प्लॉट काटती।