कैसी होगी राजधानी के इस विधानसभा चुनाव की तस्वीर
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दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार बहुमत मिलने पर बहस छिड़ी हुई है। तीनों राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं और मतदाता भी अपने स्तर पर राजनीतिक दलों की जीत के कयास लगा रहे हैं।
मगर देखने वाली बात यह है कि मतदाता वर्ष 2013 के चुनाव का अनुसरण करेंगे या फिर वर्ष 1952 से लेकर 2008 तक विधानसभा और महानगर परिषद के नौ चुनाव की भांति किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत दिलाएंगे।
वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में पहली बार खंडित जनादेश आया। उस चुनाव परिणाम की छाया से मौजूदा चुनाव भी मुक्त नहीं है। मतदाताओं का रुख स्पष्ट नहीं है। माना जा रहा है कि तिकोना मुकाबला होने के कारण इस बार भी खंडित जनादेश की संभावना है।
क्या वाकई आएगा बहुमत?
दूसरी ओर कहा जा रहा है कि जनता पहले की भांति एक दल को बहुमत देगी। यह तो 10 फरवरी हो ही मालूम होगा कि जनता ने क्या फैसला दिया है। विस और महानगर परिषद के अभी तक हुए 10 चुनाव में वर्ष 2013 के चुनाव में तीसरी ताकत सामने आई।
तीसरी ताकत बन चुकी आप ने वर्तमान चुनाव में दोनों प्रमुख दलों की नींद उड़ा रखी है। वर्ष 1952 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ था। इस चुनाव में कांग्रेस ने क्लीन स्वीप किया। वर्ष 1967 में विस के स्थान पर बनी महानगर परिषद के चुनाव में भारतीय जनसंघ भारी बहुमत से जीता। वर्ष 1972 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की।
वहीं, वर्ष 1977 में जनता पार्टी ने क्लीन स्वीप किया। लेकिन वर्ष 1983 में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की। वर्ष 1993 में एक बार फिर विधानसभा का गठन होने के हुए चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। उसके बाद 2013 तक कांग्रेस की ही सरकार रही।