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सिख विरोधी दंगों के शिकार की आपबीतीः 7 लोगों की हत्या कर शवों को आग में फेंक दिया था
Fri, 07 Jun 2019 05:11 AM IST
दुष्यंत शर्मा
धीरज बेनीवाल, नई दिल्ली
धीरज बेनीवाल, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 07 Jun 2019 05:11 AM IST
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1984 सिख विरोधी दंगों में अपने परिवार के सात सदस्यों को खोने वाला सरदूल सिंह दिलशाद गार्डन में नाम बदल कर अनिल कुमार के नाम से रह रहा था। एसआईटी ने उसे किसी तरह तलाश किया और कोर्ट में जुलाई 2017 में बयान दर्ज कराया। उसने कहा कि उसके माता पिता, भाई व बहनों को मार कर जलती आग में फेंक दिया गया था ताकि हत्या का कोई साक्ष्य ही न रहे।
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एसआईटी ने सरदूल सिंह को तलाश करने के लिए दो व तीन मार्च 2017 को एक दर्जन अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित करवाया। इसके बाद वह मिला तो केस की जांच आगे बढ़ाने का फैसला किया गया। इसके बाद उसका बयान दर्ज करवाया गया।
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कड़कडड़ूमा जिला अदालत की महानगर दंडाधिकारी छवि कपूर के समक्ष सरदूल सिंह ने कहा कि उनके घर पर दो नवंबर 1984 को करीब चार सौ लोगों की भीड़ ने हमला किया। घर में लूटपाट की गई और उसके बाद जला दिया गया। उस दिन वीरेंद्र सिंह अपने घर की छत से दोनाली बंदूक से गोलियां चला रहा था और उसने उसकी बहन विमल कौर को गोली मारी।
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राजेंद्र सिंह ने कट्टे से उसकी मां सुरजीत कौर पर गोलियां चलाईं। इससे उसकी भी मौत हो गई। वीरेंद्र व राजेंद्र के मामा कालीचरन ने उसके भाई कश्मीर सिंह पर डंडे बरसाए, जिससे उसकी भी मौत हो गई।बहन निर्मल कौर को भी गोली मारी गई। इस तरह दंगाइयों ने उसके परिवार के सात सदस्यों को मौत के घाट उतारकर शवों को जलती आग में फेंक दिया। किसी तरह उसने खाली मकान में छिपकर अपनी जान बचाई।
दंगों की जांच के लिए बने जस्टिस आरएन मिश्रा आयोग के समक्ष भी सरदूल ने 19 सितंबर 1985 को हलफनामा दिया था। इसके बाद पुलिस ने 1991 में 12 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, लेकिन कोई जांच नहीं कई गई। उस समय सरदूल छिपकर गाजियाबाद में रह रहा था।
उससे पहले उसके एक परिजन गुरमेल सिंह ने 12 दिसंबर 1984 को सरदूल के परिवार की हत्या व शवों को जलाए जाने की बात कही थी। पुलिस को कोई भी शव नहीं मिला। इसके बाद गुरमेल की भी मौत हो गई थी और केस की जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी।
सरदूल ने बयान किया अपना दर्द
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) कार्यालय में बृहस्पतिवार को सरदूल ने पत्रकारों को बताया कि पुलिस ने उसकी शिकायत पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की थी। पुलिस ने वीरेंद्र व राजेंद्र को थाने बुलाया तो उस समय भी उनके पास हथियार थे।
कमेटी के लीगल सेल के चेयरमैन जगदीप सिंह काहलो ने कहा कि एसआईटी ने इस मामले में गंभीरता से जांच की है, जिससे सरदूल को 35 साल बाद इंसाफ की उम्मीद जगी है। यह पांच महिलाओं समेत सात लोगों की हत्या कर शवों को जलाने का जघन्य मामला है। वह इस मामले में दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग करेंगे और इस लड़ाई को लगातार जारी रखेंगे।