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हाथ में डेथ सर्टिफिकेट, दिल में जिंदा होने की आस

Mon, 16 Jun 2014 02:56 PM IST
अमर उजाला, गाजियाबाद
अमर उजाला, गाजियाबाद Updated Mon, 16 Jun 2014 02:56 PM IST
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Uttrakrand tragedy: death certificate in hand, heart to be alive in the Bedroom

उत्तराखंड में आई पहाड़ों की प्रलय की आज पहली बरसी है। 16 जून 2013 को हुई इस त्रासदी ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। विभिन्न राज्यों, जिलों और कस्बों के लोग इस प्रलय से प्रभावित हुए थे।

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केदारनाथ की यात्रा पर गए गाजियाबाद के 35 लोग भी इसी प्रलय में लापता हो गए। आर्थिक मदद की घोषणा के दावों के मामलों में उत्तराखंड और यूपी सरकार का लापरवाह रवैया रहा है। उत्तराखंड सरकार ने भले ही लापता हुए सभी लोगों के डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दिए हों, मगर अपनों के जिंदा होने की उम्मीद पीड़ित परिजनों के दिलों में बाकी है।
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आज भी हर आहट पर उनकी नजर बरबस ही दरवाजे की ओर इस आस से जाती है कि शायद त्रासदी में लापता हुआ कोई अपना वापस लौट आया।

'मां-दादी के प्यार को तरस रहे बच्चे'
राजेंद्र नगर सेक्टर तीन स्थित प्लांट नंबर 9/60ए में रहने वाली मिश्रा फैमिली का हंसता खेलता परिवार केदारनाथ प्राकृतिक आपदा के बाद उजड़ गया है। घर के बच्चे मां के प्यार और दादी के दुलार को तरस गए हैं।
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अविनाश मिश्रा ने बताया कि वे अपनी पत्नी गीता मिश्रा, पिता आरके मिश्रा, माता सीता देवी, बेटे उत्कर्ष, बेटी नेहा और मानसी व अपने सास-ससुर के साथ केदारनाथ गए थे। पहाड़ी प्रलय में उनकी माता सीता देवी और पत्नी गीता मिश्रा को उनसे जुदा कर दिया।

परिवार के अन्य लोगों ने किसी तरह पहाड़ों पर ऊंचे चढ़कर अपनी जान बचाई। मां और पत्नी की याद में आज भी अविनाश की आंखें भर आती हैं। घर के छोटे बच्चे मां और दादी को आज भी याद करते हैं। अविनाश का कहना है कि न जाने क्यूं आज भी ऐसा लगता है कि मां और पत्नी जरूर वापस आएंगी।

'सिर्फ फोटो में ही पिता को देख सकेगा बेटा राघव'
राधेश्याम पार्क स्थित मां भगवती अपार्टमेंट में रहने वाले जितेंद्र कुमार अपनी तीन माह की गर्भवती पत्नी रेशमा को छोड़कर केदारनाथ गए थे। साथ गए दोस्त तो वापस आ गए, लेकिन जितेंद्र नहीं लौटे।

जितेंद्र की मां सावित्री देवी ने बताया कि बेटे के जाने से उनका पूरा परिवार ही उजड़ गया है। बेटे के लापता होने के बाद पोते राघव का जन्म हुआ। सावित्री देवी का कहना है कि सरकार ने लापता लोगों की ठीक से तलाश नहीं की। यही कारण है कि आज एक साल बाद तक भी उत्तराखंड त्रासदी में मारे गए लोगों के कंकाल पहाड़ों से बरामद हो रहे हैं।

'सही होती तलाश तो शायद बच सकती थी कई और जान'
राजेंद्र नगर के सेक्टर दो स्थित 1/62ए में रहने वाले राहुल शर्मा के भाई विक्रांत शर्मा अपनी पत्नी प्रिया, पिता, नरेंद्र कुमार, मां सरस्वती, बेटी सौम्या और बेटे निशांत के साथ केदारनाथ गए थे। विक्रांत राजेंद्र नगर सेक्टर तीन में ही किराये पर रहते थे।


पहाड़ी आपदा में पूरा परिवार ही लापता हो गया। बतौर राहुल उसने काफी तलाश की, लेकिन किसी की कोई खबर नही मिली। प्रशासनिक कार्यालयों के कई चक्कर लगाने के बाद मिला सिर्फ डेथ सर्टिफिकेट। भाभी प्रिया का डेथ सर्टिफिकेट अभी तक नहीं मिला है। उसके लिए प्रशासन के चक्कर लगा रहे हैं।

राहुल का कहना है कि अब एक साल बाद लोगों के कंकाल बरामद हो रहे हैं। कुछ समय और खोज अभियान चलाया गया होता तो शायद कुछ लोगों की जान और बच जाती।

मानव कंकाल से बंधी अंतिम संस्कार की आस
उत्तराखंड से मिल रहे कंकालों के चलते एक बार फिर पीड़ित परिजनों को आस बंधी है कि शायद लापता परिजनों की लाश उन्हें अंतिम संस्कार के लिए मिल जाए।

पीड़ित परिजनों का कहना है कि केदारनाथ घाटी के आसपास मिल रहे कंकालों का डीएनए टेस्ट कराया जाए। इससे इन लाशों को कम से कम अपनों का कंधा तो मिल जाएगा।

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