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‘अखिलेश सरकार को न तब चिंता थी और न अब है’

Mon, 16 Jun 2014 03:40 PM IST
Updated Mon, 16 Jun 2014 03:40 PM IST
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uttarakhand tragedy victims are blaiming akhilesh yadav government

उत्तराखंड त्रासदी के एक साल बीत जाने के बाद भी लोगों के जख्म भरे नहीं हैं। 16 जून 2013 की रात का भयानक मंजर याद कर आज भी शहर के वे लोग सिहर उठते हैं, जो उस तबाही में फंस गए थे।

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सबसे दुखद ये है कि केदारनाथ में आई दैवीय आपदा में हजारों लोगों ने पहले अपनों को खोने का दर्द झेला और तब से अब तक सरकार का सितम झेल रहे हैं।

हादसे के ठीक एक साल बाद सैकड़ों चक्कर काटने के बाद इन्हें परिजनों के मृत्यु प्रमाणपत्र अब मिले हैं। प्रदेश सरकार के इस लापरवाह रवैये से पीड़ित परिवार खासे आहत हैं। 16 जून को आपदा के एक साल पूरे होने पर पीड़ित परिवारों से अमर उजाला की खास बातचीत:

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‘सरकार को न तब चिंता थी और न अब है’

uttarakhand tragedy victims are blaiming akhilesh yadav government

'केदारनाथ आपदा के बाद जहां अन्य राज्यों की सरकारें अपने क्षेत्र के लोगों को बचाने के लिए जी जान से जुटी थी, उस वक्त प्रदेश सरकार का कोई भी नुमाइंदा वहां मौजूद नहीं था। अब तो मृतकों के परिजनों की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।’ ये कहना है अपने भाई के परिवार को आपदा में खोने वाले ज्ञानेंद्र शर्मा का।
 
दरअसल, सेक्टर-45 ग्राम सदरपुर निवासी ओंकार दत्त शर्मा अपनी पत्नि मुक्ता शर्मा, बेटे हार्दिक और हर्षित के साथ 11 जून 2013 को भगवान केदारनाथ के दर्शन के लिए गए थे। 16 जून को आई दैवीय आपदा में सभी सदस्य लापता हो गए।

अपने दुखों को साझा करते हुए ओंकार के बड़े भाई ज्ञानेंद्र ने कहा कि प्रदेश सरकार के रवैये का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले एक साल से मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए चक्कर काट रहे थे। अब जाकर जून में प्रमाणपत्र मिल सका है। प्रदेश सरकार पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि उनकी चिंता सरकार को न तब थी और न अब है। मृतकों के परिजन किस हालत में है इससे सरकार को कोई लेना-देना नहीं है।

‘ऐसा लगा जैसे हमसे कोई गुनाह हो गया’

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आपदा में अपनी पत्नी खोने वाले लक्ष्मी नारायण तपारिया ने कहा ‌कि आपदा में अपनों के खोने के अलावा जांच के तरीकों ने हमें बेहद दुखी किया। मृतक के परिजनों से इस तरह से जांच की गई जैसे कि केदारनाथ जाकर उनसे कोई गुनाह हो गया हो। अनगिनत बार केदारनाथ जाने के प्रमाण मांगे गए और जांच हुई।’

दरअसल, सेक्टर-30 निवासी लक्ष्मी नारायण अपनी पत्नी और अन्य पांच सगे संबंधियों के साथ पिछले साल केदारनाथ यात्रा पर गए थे। जहां इनकी पत्नी प्रभा और अन्य चार परिजन लापता हो गए। लक्ष्मी नारायण ने बताया कि हादसे के बाद कभी उत्तराखंड सरकार तो कभी प्रदेश सरकार के अधिकारी आते।

हर बार वे केदारनाथ जाने संबंधी दस्तावेज मांगते। जांच कुछ इस तरह हो रही थी जैसे की उनसे कोई गुनाह हो गया है। उन्होंने कहा कि सैकड़ों बार अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद दो दिन पहले उन्हें मृत्यु प्रमाणपत्र मिला है।

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तो बच जाती हजारों लोगों की जान!

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लक्ष्मी नारायण ने बताया कि बुखार आने की वजह से वो गौरी कुंड में रुक गए थे। पत्नी सहित अन्य परिजन दर्शन के लिए केदानाथ चले गए। दर्शन से लौटते वक्त बारिश होने लगी।

15 जून 2013 की शाम को हुई हल्की बारिश से रामगढ़ से करीब 700 मीटर आगे की पुलिया टूट गई। इस कारण काफी संख्या में लोग रामगढ़ में फंसे हुए थे।

जब आपदा आई तो सबसे ज्यादा नुकसान रामगढ़ में हुआ। लेकिन जो लोग पुलिया के पास थे वे बच गए। अगर सरकार ने पुलिया की मरम्मत समय पर करा दी होती तो हजारों लोगों की जान बच सकती थी।

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