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हरे-भरे रुद्रप्रयाग में है प्रकृति और आस्था का संगम
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Fri, 27 Dec 2013 04:52 PM IST
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उत्तराखंड स्थित रुद्रप्रयाग अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों का संगमस्थल है। यहां की ट्रिप वाकई जीवन के सबसे खूबसूरत लम्हों को जीने जैसी होती है। चोपता, तुंगनाथ बुग्याल आदि के घने जंगलों में मोनाल पक्षी और बुरांस के फूल अदभुत दृश्य बनाते हैं। वहीं केदार तुंगनाथ, चंद्रशिला से हिमालय की चोटियों के दर्शन होते हैं।
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यही पर अलकनंदा का मेल भागीरथी से होता है और गंगा नदी का निर्माण होता है। देश भर में प्रसिद्ध धर्मस्थल केदारनाथ धाम भी रुद्रप्रयाग से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। साथ ही मंदाकिनी और अलखनंदा नदियों का संगम अपने आप में एक अनोखी खूबसूरती है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो दो बहनें आपस में एक-दूसरे को गले लगा रहीं हो।
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दिल्ली से सड़क, रेल और हवाई तीनों तरह के मर्गों से पहुंचा जा सकता है। रुद्रप्रयाग से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जोलीग्रांड देहरादून है। यह रूद्रप्रयाग से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर की दूर है। नई दिल्ली से देहरादून की हवाई यात्रा के लिए करीब एक हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
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वहीं सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। वहां से रूद्रप्रयाग करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है। ऋषिकेश के लिए दिल्ली से करीब-करीब हर दो घंटे में एक ट्रेन है। लगभग ढ़ाई सौ किलोमीटर और चार घंटों वाली इस यात्रा के लिए अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार 300 से 800 रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
सड़क मार्ग के जरिए दिल्ली से रुद्रप्रयाग पहुंचने में लगभग सात घंटे लगेंगे। यहां के कई महत्वपूर्ण मार्ग गढ़वाल डिविजन से जुड़े हुए हैं। दिल्ली से रोजाना रूद्रप्रयाग के लिए बसें चलती है। करीब चार सौ किलोमीटर की इस यात्रा के लिए 900-1000 रुपये चुकाने पड़ेंगे। निजी कार बुक कराने के लिए पांच से आठ हजार रुपये लगेंगे।
यूं तो पूरा रुद्रप्रयाग अपनी अदभुत छटा के लिए जाना जाता है। यहां के एक-एक मंदिर, एक-एक टूरिस्ट प्लेस अपने आप में ढेरों कहानियां समेटे हुए है। लेकिन फिर भी रुद्रप्रयाग के आस-पास कुछ ऐसे धर्म, आस्था और प्राकृतिक गहनों से सजे स्थल हैं, जिन्हें यहां आकर मिस नहीं किया जा सकता-
अगस्त्यमुनि
मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि की दूरी 18 किलोमीटर है। यह वहीं स्थान है जहां ऋषि अगस्त्य ने कई वर्षों तक तपस्या की थी। बैसाखी के अवसर पर यहां बहुत ही बड़ा मेला लगता है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और अपने इष्ट देवता से प्रार्थना करते हैं।
दिओरिया ताल
चोपटा-ऊकीमठ मार्ग पर स्थित यह झील चारों तरफ से वनों से घिरी हुई है। हिमालय के चौकंबा शिखर का पड़ने वाला प्रतिबिम्ब इस झील को ओर अधिक खूबसूरत बनाता है।
चोपता गोपेश्वर
ऊखीमठ मार्ग से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गढ़वाल क्षेत्र में स्थित चोपता यहां के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है। यहाँ तुंगनाथ का प्राचीन मन्दिर है।
गुप्तकाशी
गुप्तकाशी का वहीं महत्व है जो महत्व काशी का है। यहां गंगा और यमुना नदियां आपस में मिलती हैं। इसकी रुद्रप्रयाग से दूरी करीब 40 किलोमीटर है। मान्यता है कि महाभारत के बाद पांडव शिव से मिलना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव पांडवों से मिलना नहीं चाहते थे इसलिए वह गुप्तकाशी से केदारनाथ चले गए। यहां पुराना विश्वनाथ मंदिर, अराधनेश्रवर मंदिर और मणिकारनिक कुंड गुप्तकाशी के प्रमुख आकर्षण केन्द्र हैं।
कार्तिकेय मंदिर
लोक कथाओं के अनुसार माता-पिता से नाराज होकर कार्तिकेय ने अपने शरीर का मांस माता पार्वती और खून पिता शिव को सौंप दिया था। इस निर्वाण रुप में वह तपस्या के लिए क्रोंच पर्वत पहुंच गए। रुद्रप्रयाग के तल्लानागपुर पट्टी स्थित क्रोंच पर्वत पर कुमार कार्तिकेय का मंदिर है। यह उत्तर भारत में कुमार कार्तिकेय का एकमात्र मंदिर है। रुद्रप्रयाग से सड़क मार्ग से दूरी करीब 38 किमी है। रुद्रप्रयाग से नियमित बस और टैक्सी द्वारा यहां पहुंच सकते हैं।
खिरसू
हिमालय के मध्य स्थित बर्फ से ढ़के पर्वतों पर स्थित खिरसू बहुत ही खूबसूरत स्थान है। यहां से कई हिमालय के कई शिखर दिखाई पड़ते हैं। खिरसू बहुत ही शांतिपूर्ण स्थल है। यहां बहुत अधिक संख्या में ओक, देवदार के वृक्ष हैं। इस लिए पर्यटकों का सबसे खास माना जाता है। इसकी रुद्रप्रयाग से दूरी करीब 50 किलोमीटर है।
सोनप्रयाग
केदारनाथ के प्रमुख मार्ग पर स्थित सोनप्रयाग प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि सोनप्रयाग के पानी को छू लेने से बैकुठ की प्राप्ति होती है। यह वहीं स्थान है जहां भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। सड़क मार्ग के बाद यहां पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर पैदल यात्रा करनी होगी। इसकी दूरी रुद्र प्रयाग से करीब 70 किलोमीटर है।
गौरीकुंड
सोनप्रयाग से गौरीकुंड की दूरी 5 किलोमीटर है। केदारनाथ मार्ग पर गौरीकुंड अंतिम बस स्टेशन है। केदारनाथ में प्रवेश करने के बाद लोग इस कुंड के गर्म पानी से स्नान करते हैं। इसके बाद गौरी देवी मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यह वहीं स्थान है जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या की थी।
केदारनाथ मंदिर
देश के प्रसिद्ध चार धामों में से एक केदारनाथ रुद्रप्रयाग से करीब 80 किलोमीटर दूर है। यहां भगवान शिव के बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक ज्योर्तिलिंग मौजूद है। हिमालय पर्वत के ऊंची-ऊंची बर्फ की सिल्लियों से ढका यह मंदिर हिन्दू धर्म के अनुयाइयों का पवित्र स्थान है।