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Mirza Ghalib: महान शायर गालिब का जन्मदिन आज, शायरी के दीवानों की मिर्जा की हवेली के आगे अभी भी लगती हैं कतारें

Tue, 27 Dec 2022 04:27 AM IST
आकाश दुबे आदित्य पाण्डेय, अमर उजाला, नई दिल्ली
आदित्य पाण्डेय, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आकाश दुबे Updated Tue, 27 Dec 2022 04:27 AM IST
सार

मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह बेग खां उर्फ गालिब था। बचपन से ही उन्हें कविताएं और शायरी का शौक था, महज 11ं साल की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। गालिब ने कई जगह काम किया।

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Today birthday of great poet Ghalib Mirza s Haveli is in Ballimaran Delhi
मिर्जा गालिब की हवेली - फोटो : amar ujala

विस्तार

मिर्जा गालिब को दुनिया से रूखसत हुए बेशक मुद्दतें बीत गईं, लेकिन फिलवक्त भी दुनिया-जहां में उनके दीवाने कम नहीं हुए। गालिब के नाम पर दिल्ली में जमने वाली महफिलें, उनकी पुस्तकों के अलग-अलग भाषाओं में हो रहे अनुवाद, उन पर प्रकाशित होने वाले शोध पत्र, गालिब की हवेली व लाइब्रेरी में बड़ी संख्या में पहुंचने वाले गालिब के प्रेमी....यह सब तस्दीक करते हैं कि गालिब आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। मौके-बेमौके लोग जाहिर भी करते हैं कि गालिब होते तो इस वक्त क्या कहते।

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गालिब का जिक्र छेड़ते ही गालिब इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. इद्रीस अहमद बोल पड़ते हैं कि एक हफ्ते पहले की ही बात है। इंस्टीट्यूट में ही हमने एक अंतरराष्ट्रीय सेमीनार किया था। देश-दुनिया से लोग इसमें शामिल हुए। सबने गालिब की शेरो शायरी में पूरी दिलचस्पी दिखाई। उन पर नवीनतम शोध भी पेश किए। वह आगे बताते हैं कि इंस्टीट्यूट की स्थित फखरुद्दीन अली अहमद रिसर्च लाइब्रेरी की लीजिए, इसमें रखी पच्चीस हजार पुस्तकों में से पच्चीस सौ से ज्यादा गालिब पर हैं।

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दुनिया में कोई भी गालिब पर नई किताब लिखी जाती है या शोध छपता हैं तो वो इस लाइब्रेरी में मंगाए जाते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए भारी संख्या में युवा यहां हरदिन आते हैं। गालिब प्रेमी और शोधार्थी सोहेल हाशमी बताते हैं कि आप चलते-चलते गौर करें तो अमूमन ज्यादातर तुकबंदियां गालिब से जोड़ दी हैं। ऐसा उनके साथ ही होता है, जो जन मानस में बसे होते हैं। असल में, गालिब की नजर में हर एक शख्स का तर्जुबा शामिल है। उन्होंने समाज के हर पहलू का देखा और अपनी कलमबंद किया। तभी मुद्दतों  बात वह आज भी हम सबमें जिंदा हैं। 

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गालिब पर छपी किताबों का हो रहा अनुवाद
गालिब इंस्टीट्यूट की ओर से गालिब का दीवान को हाल ही में पंजाबी में छपवाया गया है। कन्नड भाषा में अनुवाद का काम चल रहा है, जल्द ही बंगाली, असमी, मराठी और गुजराती भाषा में भी इसका अनुवाद होगा। इसके अलावा गालिब का काव्य संग्रह का गुजराती, मराठी, बंगाली और असमी भाषा में अनुवाद कराने की तैयारी चल रही है। डॉ इद्रीस अहमद ने बताया कि मंगलवार को सुबह 10 बजे निजामुद्दीन इलाके में स्थित गालिब की मजार पर फूल चढ़ाया जाएगा और दीये जलाए जाएंगे। उनकी मजार को फूलों से सजाया जाएगा। 

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आज है गालिब का जन्मदिन
मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। उनका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह बेग खां उर्फ गालिब था। बचपन से ही उन्हें कविताएं और शायरी का शौक था, महज 11ं साल की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। गालिब ने कई जगह काम किया। लाहौर, जयपुर और दिल्ली के बाद वह आगरा आ गए और वहीं रहने लगे। गालिब का निधन 15 फरवरी 1869 को हुआ, लेकिन आज भी मिर्जा गालिब की शायरी के बिना इश्क की दुनिया अधूरी है। इस शायर का आकर्षण उर्दू प्रेमियों के बीच इस कदर है कि बल्लीमारान स्थित उनकी हवेली को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। 16-18 दिसंबर को हुए अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी प्रो तारिक मंसूर, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एस वाई कुरैशी जैसे गालिब को समझने वाले कई जाने माने शोधार्थी शामिल थे।

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