निजी अस्पतालों की मोटी फीस के पीछे है ये कारण, इन बिजनेस मॉडल पर होता है काम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
निजी अस्पतालों का कॉरपोरेट मॉडल लोगों की जेब पर भारी पड़ने लगा है। करोड़ों की लागत के बाद मुनाफे के लक्ष्य की कीमत मरीजों को चुकानी पड़ रही है।
अधिक से अधिक शहरों में ब्रांच खोलने की होड़ में अस्पतालों के कॉरपोरेट मॉडल ने डॉक्टरों की फीस बढ़ाने के साथ सुविधाओं के नाम पर रुपये ऐंठना भी शुरू कर दिया है।
वहीं, दूसरी ओर बदहाल सरकारी व्यवस्था के बीच जिंदगी की आस लेकर निजी अस्पताल जाना मरीजों और उसके परिजनों के लिए मजबूरी भी है। फोर्टिस अस्पताल द्वारा 15 दिन के डेंगू के इलाज के एवज में 16 लाख का बिल का मामला सामने आने के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इन जैसे अस्पतालों की फीस इतनी अधिक क्यों है?
विशेषज्ञों की मानें तो राजनीतिक संरक्षण के कारण ही निजी अस्पताल तेजी से बढ़े हैं। सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था के कारण अधिकांश लोगों का सरकारी अस्पताल से विश्वास उठता जा रहा है और इसका फायदा निजी अस्पताल उठा रहे हैं।
हर अस्पताल का का अपना वर्किंग बिजनेस मॉडल है
निजी अस्पतालों का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसी का फायदा निजी अस्पताल उठा रहे हैं। हर निजी अस्पताल अब कॉरपोरेट के तर्ज पर काम कर रहा है।
हरेक अस्पताल का अपना वर्किंग बिजनेस मॉडल है। इसमें छोटे ओहदे पर तो डॉक्टरों को फिक्स तनख्वाह दी जाती है, लेकिन धीरे-धीरे वह राजस्व और लाभांश के भी हकदार हो जाते हैं। इसमें फार्मास्यूटिकल कंपनियों का भी बड़ा योगदान है।
एक निजी अस्पताल से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि अमूमन बड़े अस्पतालों में विदेशी निवेशकों ने पैसा लगा रखा है। उनका मकसद मुनाफा होता है। ऐसे में निवेशक प्रबंधन पर दबाव बनाते हैं।
निवेश के एवज में मुनाफे का कुछ हिस्सा देना होता है। मशीनें, व्यवस्था और सेवाओं के शुल्क का जरिया केवल मरीज ही होता है। जिसके कारण अधिक चार्ज वसूला जाता है।
इन बिजनेस मॉडल पर करते हैं काम
-लाभांश मॉडल
इसमें डॉक्टर कोई फीस लेने के बजाय अस्पताल के कुल आमदनी में अपना लाभांश लेते हैं। इसमें आमतौर पर ऐसे नामचीन डॉक्टर होते हैं, जिन्हें किसी विशेष विधा में महारत हासिल है। इसमें हर ऑपरेशन, टेस्ट और ओपीडी फीस के वार्षिक आकलन के आधार पर डॉक्टर अपना लाभांश तय करते हैं। इसमें बड़े कॉरपोरेट अस्पताल नामचीन डॉक्टर के आसरे अधिक मरीजों को खींचने के लिए यह मॉडल अपनाते हैं।
-सर्विस मॉडल
इसमें हर सेवा के बदले एक फीस तय की जाती है। विभिन्न विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं ली जाती है। इसके एवज में चिकित्सक अस्पताल में 15-20 फीसदी रकम लेता है। इसी रकम के जरिये वह पूरी तरह से अस्पताल का संचालन व रखरखाव का काम करता है। आमतौर पर छोटे अस्पताल इस तरह का मॉडल अपना रहे हैं।
-राजस्व मॉडल
इसमें सभी डॉक्टरों को एक लक्ष्य दिया जाता है। सभी डॉक्टरों को अच्छी तनख्वाह के साथ मरीजों की संख्या भी बताई जाती है। इसमें मरीज से होने वाली आमदनी के आधार पर उन्हें पैसे दिए जाते हैं। यदि डॉक्टर दिए गए लक्ष्य से कम मरीज देखता है तो उसकी तनख्वाह भी काट ली जाती है। हाल ही में गुरुग्राम में एक अस्पताल में यह मामला सामने आया था।
-सैलरी मॉडल
अमूमन सभी अस्पतालों में ओपीडी में तैनात डॉक्टरों को सैलरी मॉडल के तहत तनख्वाह दी जाती है। जूनियर डॉक्टरों से लेकर बड़े ओहदे पर तैनात डॉक्टरों को तनख्वाह दी जाती है। इसके साथ ही उन्हें इंसेंटिव भी दिया जाने का प्रावधान किया जाता है। अधिक मरीज देखने के एवज में अधिक पैसे मिलते हैं। इसमें टेस्ट समेत अन्य खर्चों का सीधे कोई भागीदारी नहीं होता है।
मोटी फीस के पीछे इनका भी रहता है हाथ
कई अस्पतालों केे पैनल में शामिल वरिष्ठ वकील आदित्य त्यागी कहते हैं मोटी फीस के पीछे अस्पतालों में फार्मास्यूटिकल कंपनियों का बड़ा हाथ है। सामान्य दवा के एवज में किसी ब्रांड का नाम लिखने के बदले में डॉक्टरों को कमीशन दिया जाता है।
उन्हें विदेशों के दौरे, समय-समय पर गिफ्ट, बच्चों की पढ़ाई समेत कई तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। इन सुविधाओं के लालच में डॉक्टर वह दवा लिखते हैं।
ब्रांडेड दवाई जहां 200 रुपये की होती है, वहीं जेनरिक महज 15-20 रुपये में आ जाती है। इसके कारण मरीजों को एक सामान्य दवा के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।