फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   The insistence on becoming a teacher lost helplessness

हादसे में गंवाया दायां हाथ, हौसले के आगे हारी लाचारी

Tue, 08 Mar 2016 07:20 AM IST
दीपक शर्मा/अमर उजाला, दनकौर
दीपक शर्मा/अमर उजाला, दनकौर Updated Tue, 08 Mar 2016 07:20 AM IST
विज्ञापन
The insistence on becoming a teacher lost helplessness
उमेश नागर के हौसले के आगे हारी जिंदगी - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नोएडा

कभी महक की तरह गुलों से उड़ते हैं, कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं, ये कैंचियां हमें उड़ने से क्या खाक रोकेंगी, हम परों से नहीं, हौसलों से उड़ते हैं। मशहूर शायर राहत इंदौरी की ये पंक्तियां उमेश नागर के संघर्ष की कहानी बयां करती हैं।

विज्ञापन


14 साल पहले उन्होंने एक हादसे में अपना दायां हाथ खो दिया था, लेकिन उनके कड़े संघर्ष और शिक्षिका बनने सपना पूरा करने की जिद के आगे लाचारी हार गई। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की, फिर बीटीसी के बाद डीलिट किया और अब वह शिक्षिका हैं।
विज्ञापन


च्चों को पढ़ाते वक्त बाएं हाथ से ब्लैक बोर्ड पर लिखना आज भी उनके लिए मुश्किल होता है लेकिन निराशा उन्हें मंजूर नही। दनकौर के नवादा गांव की उमेश नागर ने बताया कि उनका शुरू से ही शिक्षिका बनने का सपना था। 2002 में दसवीं की बोर्ड परीक्षा के समय एक दिन चारा काटने वाली मशीन की चपेट में उनका दायां हाथ आ गया।

विज्ञापन
विज्ञापन

संक्रमण फैलने की वजह से डॉक्टर को हाथ काटना पड़ा

The insistence on becoming a teacher lost helplessness
उमेश नागर - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, नोएडा

इलाज के दौरान संक्रमण फैलने की वजह से डॉक्टर को हाथ काटना पड़ा। इसके बाद उन्हें पढ़ाई बंद होने की चिंता सताने लगी, लेकिन परिवार के सभी लोगों ने हौसला बढ़ाया और बाएं हाथ से लिखने में मदद करने लगे।

परिवार के सहयोग से धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ने लगा और फिर शुरू हुआ उनका संघर्ष। बाएं हाथ से लिखने की आदत हो गई। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद 2005 में उनकी शादी हो गई और उनके पति मुकेश नागर ने भी उनकी पढ़ाई के प्रति रुचि को देखकर पढ़ाने में मदद की।

शादी के बाद साल 2007 में बीटीसी और फिर डीलिट करने के बाद दनकौर के अमरपुर गांव के सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। लंबे संघर्ष के बाद पिछले साल जून 2015 में शासन की ओर से समायोजन के बाद उन्हें नवादा गांव के ही सरकारी स्कूल में नियुक्ति मिल गई।

हालांकि स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय ब्लैक बोर्ड पर लिखते वक्त उन्हें आज भी परेशानी होती है। उनका कहना है कि व्यक्ति को किसी हादसे से लाचार न होकर जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed