12 कालेजों के शिक्षकों को चार महीने से नहीं मिला वेतन, बुधवार से डूटा की तीन दिवसीय हड़ताल
- चार दिन पहले प्रशासन ने छह कालेजों का एक महीने का वेतन किया जारी
- गवर्निंग बॉडी न बनाने को लेकर दिल्ली सरकार को थी आपत्ति, 12 में से 8 से अधिक कॉलेजों में बन चुकी गवर्निंग बॉडी, फिर भी रुका हुआ है वेतन
विस्तार
दिल्ली विश्वविद्यालय के 12 कालेजों में वेतन के लिए फंड न दिए जाने केे मुद्दे पर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) बुधवार से तीन दिनों की हड़ताल आयोजित करेगा। इस दौरान विश्वविद्यालय के शिक्षक कक्षाएं नहीं लेंगे। डूटा ने मांग की है कि दिल्ली सरकार सभी कॉलेजों के लिए तुरंत फंड जारी करे। चार दिन पहले प्रशासन ने छह कालेजों का एक महीने का वेतन जारी किया है। शिक्षकों की मांग है कि सरकार पूरा वेतन अविलंब जारी करे।
डूटा के सचिव आलोक पांडेय ने अमर उजाला को बताया कि पिछले चार महीनों से दिल्ली सरकार से संबंधित 12 कालेजों के शिक्षकों-कर्मचारियों का वेतन नहीं दिया गया है। दिल्ली सरकार इसके लिए कभी कॉलेजों में गवर्निंग बॉडी न होने का बहाना बनाती है तो कभी अकाउंट्स के आडिट कराने की बात कहती है। लेकिन डूटा का कहना है कि शिक्षकों का वेतन और गवर्निंग बॉडी दो अलग-अलग मुद्दे हैं और सरकार को केवल इस आधार पर फंड नहीं रोकना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार की सबसे बड़ी आपत्ति गवर्निंग बॉडी को लेकर थी, आठ से अधिक कॉलेजों में गवर्निंग बॉडी बनाई जा चुकी है। आरोप है कि इसके बाद भी फंड जारी नहीं किया जा रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी एकेडमिक काउंसिल के सदस्य राजेश झा ने कहा कि कोरोना के गंभीर माहौल में शिक्षकों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। ऑनलाइन कक्षाओं से लेकर परीक्षाओं को आयोजित कराने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन इस समय पर उन्हें वेतन नहीं दिया जा रहा है। इसके पहले भी वे इस मुद्दे पर कई बार विरोध आयोजित कर चुके हैं, लेकिन सरकार ने इसके बाद भी वेतन जारी नहीं किया।
एडहॉक शिक्षक को हटाने पर विवाद बढ़ा
दौलतराम कॉलेज की शिक्षक रितु सिंह को हटाए जाने को लेकर विवाद बढ़ गया है। मंगलवार को डूटा ने कॉलेज के बाहर धरना दिया और कॉलेज प्रशासन से रितु सिंह की सेवाएं बहाल किये जाने की मांग की। कथित तौर पर उन पर कक्षाओं में जातिगत टिप्पणियां करने का आऱोप है। हालांकि, स्वयं रितु सिंह ने इस बात से इंकार किया है। रितु सिंह ने अमर उजाला से कहा कि वे सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहती हैं। यही कारण है कि झूठे आरोपों को आधार बनाकर उन्हें हटाया जा रहा है। वे पिछले एक वर्ष से विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं दे रही हैं और इस दौरान उनके खिलाफ कोई बात सामने नहीं आई है।