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Delhi: इलाज के बाद भी टीबी रोगियों में जोखिम अधिक, आईसीएमआर के शोधार्थियों के अध्ययन में खुलासा
Mon, 11 Jul 2022 06:47 AM IST
विजय पुंडीर
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: विजय पुंडीर
Updated Mon, 11 Jul 2022 06:47 AM IST
सार
एनआईआरटी के निदेशक डॉ. पद्मप्रियदर्शनी सी ने बताया कि बीते कुछ वर्षों में बेहतर इलाज की वजह से मृत्यु दर में गिरावट आई है, लेकिन इलाज के बाद भी रोगियों में लंबे समय तक जान का जोखिम चिंता का विषय बना हुआ है।
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टीबी के मरीज
- फोटो : Social Media
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विस्तार
इलाज के बाद भी टीबी रोगियों में जोखिम अधिक बना रहता है। चेन्नै स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन ट्यूबरकुलोसिस के शोधार्थियों ने चिकित्सीय अध्ययन में निष्कर्ष निकाला है कि टीबी का इलाज पूरा होने के बाद भी रोगी में मृत्यु दर और कम जीवन प्रत्याशा का जोखिम बना रहता है।
एनआईआरटी के निदेशक डॉ. पद्मप्रियदर्शनी सी ने बताया कि बीते कुछ वर्षों में बेहतर इलाज की वजह से मृत्यु दर में गिरावट आई है, लेकिन इलाज के बाद भी रोगियों में लंबे समय तक जान का जोखिम चिंता का विषय बना हुआ है। अध्ययन के दौरान पता चला कि जिन लोगों को टीबी नहीं है उनकी तुलना में टीबी का इलाज कराने वालों में मृत्यु दर दो गुना अधिक थी।
डॉ. पद्मप्रियदर्शिनी ने कहा, उपचार पूरा होने के बाद भी रोगियों के जीवन की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। चूंकि पोस्ट टीबी रोग न केवल व्यक्ति बल्कि देश की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। इसलिए एनटीईपी को टीबी उपचार के बाद मृत्यु दर को कम करने के लिए उपयुक्त रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का संकल्प लिया है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सभी राज्यों के साथ मिलकर जन जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन कोरोना महामारी के बाद से टीबी मरीजों का उपचार और अधिक चुनौतीपूर्ण है।
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महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मृत्यु दर अधिक
अध्ययन में यह तथ्य भी सामने आया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मृत्यु दर अधिक है। अध्ययन में 4,022 टीबी रोगियों को शामिल किया गया था। उपचार कराने के बाद जब व्यक्तियों का लंबे समय तक फॉलो-अप किया गया तो पता चला कि बीमारी से प्रभावित लोगों में समय से पहले होने वाली मौतों की संख्या अधिक थी। अधिकांश मौतें इलाज पूरा करने के बाद पहले वर्ष में हुईं।
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एनआईआरटी के निदेशक डॉ. पद्मप्रियदर्शनी सी ने बताया कि बीते कुछ वर्षों में बेहतर इलाज की वजह से मृत्यु दर में गिरावट आई है, लेकिन इलाज के बाद भी रोगियों में लंबे समय तक जान का जोखिम चिंता का विषय बना हुआ है। अध्ययन के दौरान पता चला कि जिन लोगों को टीबी नहीं है उनकी तुलना में टीबी का इलाज कराने वालों में मृत्यु दर दो गुना अधिक थी।
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डॉ. पद्मप्रियदर्शिनी ने कहा, उपचार पूरा होने के बाद भी रोगियों के जीवन की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। चूंकि पोस्ट टीबी रोग न केवल व्यक्ति बल्कि देश की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। इसलिए एनटीईपी को टीबी उपचार के बाद मृत्यु दर को कम करने के लिए उपयुक्त रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का संकल्प लिया है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सभी राज्यों के साथ मिलकर जन जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं, लेकिन कोरोना महामारी के बाद से टीबी मरीजों का उपचार और अधिक चुनौतीपूर्ण है।
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महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मृत्यु दर अधिक
अध्ययन में यह तथ्य भी सामने आया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मृत्यु दर अधिक है। अध्ययन में 4,022 टीबी रोगियों को शामिल किया गया था। उपचार कराने के बाद जब व्यक्तियों का लंबे समय तक फॉलो-अप किया गया तो पता चला कि बीमारी से प्रभावित लोगों में समय से पहले होने वाली मौतों की संख्या अधिक थी। अधिकांश मौतें इलाज पूरा करने के बाद पहले वर्ष में हुईं।