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पुलिस केंद्र के अधीन तो थाने दिल्ली सरकार के दायरे में कैसे आ सकते हैं : सुप्रीम कोर्ट
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 30 Aug 2018 11:16 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दिल्ली सरकार से सवाल किया कि जब पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है तो थाने उसके दायरे में कैसे आ सकते हैं। जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली सरकार के वकील शेखर नाफडे की उस दलील पर की जिसमें उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) दिल्ली सरकार के दायरे में होनी चाहिए।
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सीआरपीसी में इसका प्रावधान है। पीठ दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों को लेकर संविधान पीठ के फैसले के बाद सर्विस संबंधी कई अन्य मुद्दों पर गतिरोध को लेकर सुनवाई कर रही है।
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दिल्ली सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 23 जुलाई, 2014 और 21 मई 2015 को जारी अधिसूचनाओं को चुनौती दी है। इन अधिसूचनाओं में दिल्ली के प्रशासनिक अधिकार को सीमित किया गया है। इसके तहत दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा उसके अधिकारियों तक ही सीमित है।
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केंद्र सरकार के अधिकारियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इससे पहले दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पी. चिदंबरम ने कहा कि दानिक्स और दानिप्स अधिकारियों की नियुक्ति जब दिल्ली में होती है तो वे अधिकारी दिल्ली सरकार के अधीन होने चाहिए। मामले की अगली सुनवाई चार सितंबर को होगी।
गत चार जुलाई को पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने साफ किया था कि सांविधानिक प्रावधानों के तहत दिल्ली के उपराज्यपाल को खुद से कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। उपराज्यपाल को या तो मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करना होगा या किसी मसले पर असहमति होने पर वह मसले को राष्ट्रपति के पास भेजेंगे और उनका निर्णय मानना उपराज्यपाल के लिए बाध्यकारी है।
पीठ ने कहा था कि उपराज्यपाल को संघीय सहयोगपूर्ण के सिद्धांत और सांविधानिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए। संघीय व्यवस्था के तहत भारत सरकार सभी अधिकार अपने पास नहीं रख सकता। राज्य को भी बिना भारत सरकार की दखलअंदाजी के अपने क्षेत्राधिकार में काम करने की आजादी है।
दिल्ली सरकार का कहना है कि संविधान पीठ का फैसला उसके हक में आने के बावजूद वह काम नहीं कर पा रही है। काम पूरी तरह से ठप पड़ा है। सरकार न तो अधिकारियों की पोस्टिंग कर पा रही है न ही ट्रांसफर।