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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Structural flaws in Barapullah Phase-3; traffic jams expose the project's shortcomings.

Delhi NCR News: बारापुला फेज-3 में ढांचागत खामियां, जाम ने खोली परियोजना की पोल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2026 07:03 PM IST
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सरकार ने माना- भविष्य के ट्रैफिक का आकलन डिजाइन में नहीं हुआ, अब तकनीकी जांच से निकलेगा समाधान
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सराय काले खां से आईटीओ तक फुटपाथ हटाकर एक लेन बढ़ाने पर विचार, नए ट्रैफिक फ्लो के हिसाब से बदलेगा इंतजाम
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सिग्नल फ्री आवाजाही के लिए तैयार किए गए बारापुला फेज-3 कॉरिडोर पर लगातार लग रहे जाम ने परियोजना की ढांचागत खामियों को सामने ला दिया है। दिल्ली सरकार ने भी अब माना है कि कॉरिडोर में ऐसी कमियां हैं, जिन्हें दूर किए बिना मौजूदा और भविष्य के ट्रैफिक दबाव को संभालना मुश्किल होगा। सरकार ने इन खामियों की तकनीकी जांच कराने के लिए ट्रैफिक और डिजाइन कंसल्टेंट नियुक्त करने का फैसला किया है। कंसल्टेंट कॉरिडोर का अध्ययन कर तत्काल और दीर्घकालिक सुधार के सुझाव देगा।
पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने बुधवार को बारापुला फेज-3 पर जाम की स्थिति को लेकर पिछली आम आदमी पार्टी सरकार के समय तैयार किए गए डिजाइन पर सवाल उठाए। मंत्री के मुताबिक उस समय डिजाइन तैयार करते हुए भविष्य में बढ़ने वाले ट्रैफिक को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त जगह नहीं छोड़ी गई। कॉरिडोर शुरू होने के बाद जब अलग-अलग दिशाओं से आने वाला ट्रैफिक इस पर पहुंचा तो कई हिस्सों में लेन मर्जिंग की समस्या सामने आई। इससे पीक आवर्स में वाहनों की रफ्तार प्रभावित हो रही है और जाम लग रहा है।
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सरकार अब इस समस्या को केवल ट्रैफिक प्रबंधन से नहीं, बल्कि कॉरिडोर की संरचना और डिजाइन में जरूरी बदलाव के जरिए दूर करने की तैयारी कर रही है। उपलब्ध सड़क की जगह का बेहतर इस्तेमाल, लेन बढ़ाना, मर्जिंग प्वाइंट में सुधार और ट्रैफिक के रास्ते को नए सिरे से व्यवस्थित करना प्रस्तावित है।
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बारापुला फेज-3 को 2017 तक पूरा किया जाना था, लेकिन भूमि अधिग्रहण, पेड़ों की अनुमति, यूटिलिटी शिफ्टिंग समेत कई अड़चनों के कारण परियोजना वर्षों तक अटकी रही। लंबे इंतजार के बाद कॉरिडोर शुरू हुआ तो ट्रैफिक इंटीग्रेशन से जुड़ी कमियां सामने आ गईं।
बदलता ट्रैफिक फ्लो डिजाइन के लिए बन रहा चुनौती
बारापुला फेज-3 को सराय काले खां से मयूर विहार तक सिग्नल फ्री और बेहतर कनेक्टिविटी देने के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन कॉरिडोर शुरू होने के बाद इसका इस्तेमाल अनुमान से कहीं व्यापक ट्रैफिक कर रहा है। डीएनडी फ्लाईवे, एनएच-24, रिंग रोड और सराय काले खां के अलावा आरआरटीएस और मेट्रो नेटवर्क से जुड़ाव के कारण अलग-अलग दिशाओं से आने वाला यातायात यहां पहुंच रहा है। यही बदलता ट्रैफिक फ्लो अब परियोजना के मूल डिजाइन के लिए चुनौती बन रहा है। कुछ हिस्सों में कई दिशाओं से आने वाला ट्रैफिक कम लेन में सिमट जाता है। सरकार का मानना है कि इस लेन मर्जिंग को ठीक किए बिना जाम की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
फुटपाथ हटाकर एक अतिरिक्त लेन बनाने का सुझाव

ट्रैफिक पुलिस ने सराय काले खां से आईटीओ के बीच फुटपाथ हटाकर एक अतिरिक्त लेन बनाने का सुझाव दिया है। इसके अलावा दो-तीन अन्य विकल्प भी सरकार के सामने आए हैं। तकनीकी कंसल्टेंट इन विकल्पों की व्यवहारिकता की जांच करेगा। जरूरत के मुताबिक लेन चैनलाइजेशन, रूट मैनेजमेंट और मर्जिंग प्वाइंट में बदलाव किए जाएंगे। मंत्री के मुताबिक तत्काल और स्थायी, दोनों स्तरों पर समाधान तलाशे जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि अगले 10-15 दिन में जाम की स्थिति में सुधार दिखाई देने लगेगा।
रिंग रोड पर गुरुद्वारे के सामने यू-टर्न या कट बनाने की संभावना भी देखी जा रही

स्थानीय ट्रैफिक को राहत देने के लिए रिंग रोड पर गुरुद्वारे के सामने डेडिकेटेड यू-टर्न या कट बनाने की संभावना भी देखी जा रही है। इससे सिद्धार्थ एक्सटेंशन के लोगों को पुराने बारापुला की ओर सीधे जाने का रास्ता मिल सकता है। लाजपत नगर, आईएनए और एम्स की ओर जाने वाले वाहनों को भी लंबा रास्ता नहीं लेना पड़ेगा। इससे गलत दिशा में वाहन चलाने की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है।
नए ट्रैफिक पैटर्न को लेकर गूगल से भी बात

कॉरिडोर के नए रूट का असर नेविगेशन सिस्टम पर भी पड़ा है। मंत्री के मुताबिक गूगल से नए ट्रैफिक पैटर्न और सड़क मार्ग को अपडेट करने को लेकर बातचीत हुई है। ट्रैफिक पुलिस भी मैपिंग अपडेट कराने के लिए समन्वय कर रही है।

640 करोड़ रुपये के भुगतान पर उठे सवाल
इस बीच परियोजना के वित्तीय फैसले भी जांच के दायरे में हैं। मंत्री ने आरोप लगाया कि आर्बिट्रेशन के जरिए ठेकेदार को करीब 640 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया। उनके मुताबिक मौजूदा सरकार के सत्ता में आने तक परियोजना का करीब 80 फीसदी भुगतान हो चुका था। सरकार अब परियोजना में हुई देरी, बढ़ी लागत और आर्बिट्रेशन से जुड़े मामलों की भी समीक्षा करेगी।
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