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अंतरराष्ट्रीय डाक दिवस विशेषः तकनीक ने लोगों को किया सोशल मीडिया तक सीमित

Wed, 09 Oct 2019 05:08 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 09 Oct 2019 05:08 AM IST
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Special on International Postal Day as Technology limited people to social media
आज अंतरराष्ट्रीय डाक दिवस है - फोटो : अमर उजाला
एक समय था जब लोग चिट्ठियों के इंतजार में रात- दिन एक कर दिया करते थे। लेकिन बदलते परिवेश और बढ़ती तकनीक ने लोगों को मोबाइल के जरिये महज सोशल मीडिया तक ही सीमित कर दिया है। 
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आलम यह है कि आज अंतरराष्ट्रीय डाक दिवस है और आज की युवा पीढ़ी चिट्ठी, पोस्टकार्ड और ग्रीटिंग के महत्व से ही जुदा है। इस दिन के महत्व के बारे में अमर उजाला ने जब बुजुर्गों से बात की, तो पता लगा कि एक जमाना था तब चिट्ठियां ही लोगों की जीवनरेखा हुआ करती थीं।
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आईएएस अभिषेक गुप्ता ने बताया कि 27 साल पहले जब अधिकारी बने तो माता-पिता से पहली बार दूर हुए। उनकी पहली पोस्टिंग शिमला में हुई और तभी उन्होंने अपने माता-पिता को चिट्ठियां लिखनी शुरू कीं। उन्होंने कहा कि वह हर दूसरे दिन अपनी पूरी दिनचर्या को लिखकर अपनी मां को भेजते थे और उनके पत्र का इंतजार भी करते थे। 
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उन्होंने कहा कि उस समय चिट्ठियां उनकी लाइफ लाइन थीं। उन्होंने कहा कि करीब 20 सालों से चिट्ठियों का प्रयोग कम होता गया और आज चिट्ठियां और पोस्टकार्ड की जगह ई-मेल और सोशल मीडिया ने ले ली है। उन्होंने कहा कि यह चिंता का विषय है कि पहले लोग दूर होते हुए भी पत्रों के जरिये आपस में प्रेम बनाए रखते थे, लेकिन आज जितना लोग आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही अपनों से दूर भी होते जा रहे हैं।

वहीं, साहित्यकार डॉ शैफालिका वर्मा ने कहा कि पत्र लेखन आत्माभिव्यक्ति का एक सशक्त साधन था। यदि किसी पर गुस्सा भी आता तो लोग पत्र लिखते और गुस्सा भी शांत हो जाता। उन्होंने कहा कि जमाना बदला, वैचारिक वैज्ञानिक क्रांति से सारा विश्व एक गांव बन गया, ईमेल से शुरू हुआ और अब मोबाइल पर आ टिका। 


आज के बच्चे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र तो दूर वो तो टेलीग्राम, के बारे में भी नहीं जानते। उन्होंने बताया कि पहले जब कोई टेलीग्राम आता था तो उसका संकेत किसी अनहोनी की ओर जाता था और चिट्ठी आती थी तो लोगों को पहले ही पता लग जाता था कि कोई खुशी की बात है। 
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