कैंसर सर्वाइवर की कहानी: 'मैं तो योग करती थी', रितु कपूर बोलीं- खामोशी में बदल गई थी जिंदगी... हार नहीं मानी
नेशनल कैंसर सर्वाइवर्स मंथ में कैंसर से जंग जीतने वाले कुछ लोगों ने विशेष बातचीत की। कैंसर सर्वाइवर रितु कपूर ने कहा कि बीमारी सुनते ही जैसे आंखों के सामने अंधेरा छा गया। कुछ समझ नहीं आ रहा था, पति के साथ पूरे परिवार का सहयोग मिला।
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वो समय था कि रिपोर्ट देखते ही लगा कि वक्त थम गया, पैर के नीचे से जमीन खिसक गई। दिल में एक ही सवाल गूंजा, क्यों मैं ? लेकिन यही वो पल था जब हार मानने की बजाय, जिंदगी की लड़ाई शुरू हुई और कैंसर को हराकर अब दूसरों की उम्मीद बन गई हूं। ऐसे ही कुछ लोग हैं जिन्होंने कैंसर को हराकर मिशाल पेश की हैं। कैंसर से जंग जीतने वाले ऐसे ही कुछ लोगों ने विशेष बातचीत।
खामोशी में बदल गई थी जिंदगी, लेकिन हार नहीं मानी : रितु कपूर
पिछले साल जुलाई का समय था, अचानक स्तन पर एक गांठ महसूस हुई। मु़झे लगा कि ऐसे ही होगा। योगा करती हूं स्वस्थ जिंदगी जी रही हूं, मुझे कुछ नहीं हो सकता। समय बीता तो दूसरे स्तन पर भी वैसी ही गांठ ही महसूस। तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया। उन्होंने अल्ट्रासाउंड करने का सुझाव दिया। इस जांच में कैंसर का पता चला। यह सुनते ही जैसे आंखों के सामने अंधेरा छा गया। कुछ समझ नहीं आ रहा था, पति के साथ पूरे परिवार का सहयोग मिला। जांच शुरू करवाई। डॉक्टर से सर्जरी कर कैंसर के प्रभावित अंग को हटा दिया। यह मेरे लिए बड़ी चुनौती थी। लेकिन हार नहीं मानी।
आगे कहा कि कीमोथेरेपी की हर बारी में शरीर कमजोर होता गया, आइने में चेहरा भी पहचान में नहीं आता था। लेकिन हर गिरते बाल के साथ एक वादा और पक्का होता गया। पूरे आठ कीमो और स्तन पुनर्निर्माण के बाद दिसंबर में इलाज पूरा हुआ। करीब एक साल होने को आए इस कैंसर को हराकर दूसरों को भी हिम्मत दे रही हूं। बीते एक साल में दर्द के बीच 25वीं शादी की सालगिरह जन्मदिन का हर्ष मनाया और यह सब पति और परिवार का साथ। इलाज के साथ योग की मदद से हो सका।
कैंसर को हराया, जारी है अभी भी जंग : दीबा सिद्दीकी
मां का दुख, पिता की परेशानी के बीच साल 2014 में स्तर कैंसर का पता चला। उस समय सिर्फ 22 साल की मेडिकल छात्र थी। भविष्य बनाना चाहती थी, तब कैंसर ने मेरी जिंदगी तबाह करने की कोशिश की। आर्थिक तंगी, मानसिक दबाव मुझे कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे, जैसे तैसे परिवार के सहयोग इलाज शुरू हुआ। भाई के सहयोग से इलाज शुरू हुआ। भगवान को लेकिन कुछ और ही मंजूर था। साल 2022 में बोन और लंग्स कैंसर का पता चला। अब इन दोनों से जंग जारी हैं। लंबे इलाज के बाद स्तन कैंसर को हराया। अब बोन और लंग्स कैंसर को भी हरा रही हूं। इनसे सर्वाइव करते हुए जीवन को बेहतर भी बनाया। आज, मुझे हर चुनौती छोटी लगती है। इस कैंसर से लड़ते हुए ही पोषण और आहार विशेषज्ञ की पढ़ाई पूरी की। इलाज के दौरान लिखे गए मेरे लेख को विश्व भर में मान्यता मिली। लेख पर ऑस्ट्रेलिया की संस्था ने सम्मानित तक किया।
हार मानना सीखा ही नहीं : सत्यदीप पाराशर
मैं पहलवानों के परिवार से आता हूँ, इसलिए मैंने कभी हार मानना नहीं सीखा। करीब 10 साल पहले जब ओरल कैंसर ने मुझे पछाड़ने की कोशिश की, तो मैं अपने डॉक्टरों के भरोसे और भीतरी साहस के साथ दुबारा खड़ा हुआ और लड़ाई लड़ी। उस समय पिता के डायलिसिस चल रहे थे। बच्चे काफी छोटे थे। ऐसे में हार कैसे मानता। पत्नी के सहयोग से सर्जरी करवाई। फिर कीमो चला। लंबे इलाज के बाद अब ठीक हूं और दूसरों को भी कैंसर से जीतने की राह दिखा रहा हूं। एक शिक्षक होने के नाते, मैंने कई लोगों को उनके सबसे कठिन शैक्षणिक संघर्षों में मार्गदर्शन किया है, लेकिन यह मेरा संघर्ष था। इससे गुजरने के बाद मैं और भी मजबूत बनकर उभरा हूं।
कैंसर मरीजों को नई राह देगा कैनविन
निजी अस्पताल की डॉक्टर गीता गर्ग ने बताया कि कैंसर से हराने में इससे जीतने वाले अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा मरीजों को सही जानकारी देने वह जल्द ठीक हो सकते हैं। इसी उद्देश्य से अपोलो कैंसर सेंटर कैनविन नामक कैंसर सहायता समूह शुरू किया है। जो कैंसर के सफर में सभी को एक साथ लाता है।