नोएडा उपचुनाव: चेहरों के साथ मोहरे भी बदले
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विधानसभा उपचुनावों में नोएडा सीट सपा और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। लेकिन, इन चुनावों का पूर्वानुमान लगाना काफी मुश्किल साबित हो रहा है।
इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि पार्टी प्रत्याशियों के चेहरे भी बदले हैं और चुनावी चौसर के मोहरे भी। इस सीट पर कद्दावर मंत्रियों की पूरी ताकत झोंकने वाली सपा हर हाल में जीत चाहती है। और, सत्तारूढ़ पार्टी की यही जिद मोदी लहर पर सवार भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन रही है। इस बीच कांग्रेस भी है, जिसके पास खोने को कुछ भी नहीं है।
लोकसभा चुनावों के मेगा शो के बाद उपचुनावों में भी भाजपा बाजी मारने के लिए कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन, यही हाल सपा का भी है। सपा की कोशिश है कि नोएडा सीट जीतकर वह यह संदेश दे कि जनता अभी उसके साथ है और साथ ही यह भी कि मोदी लहर अब ठंडी पड़ गई है।
सपा ने साफ छवि वाली काजल शर्मा को प्रत्याशी बनाया है। साथ ही कैबिनेट मंत्री नारद राय के हाथ में चुनाव की कमान सौंपी है। सहयोगियों के रूप में साथी मंत्री हैं, पूर्व सांसद सुरेंद्र नागर हैं और विधायक गुड्डू पंडित व मुकेश शर्मा भी टीम में हैं। लेकिन, चुनावी फैसलों में नारद राय का वजन सबसे ज्यादा है।
सपा-भाजपा के मुकाबले कमजोर है कांग्रेस!
उधर, भाजपा ने विमला बाथम को उतारा है। चुनाव का जिम्मा मेरठ के अमित अग्रवाल के हाथों में है, जो यहां चुनाव प्रभारी बनाए गए हैं। उनकी टीम में सांसद डॉ. महेश शर्मा, वरिष्ठ नेता हरिश्चंद्र भाटी आदि शामिल हैं।
दोनों ही पार्टियों की चुनावी कमान बाहरी हाथों में है और यही बात इन चुनावों को पेचीदा और दिलचस्प बना रही है। उधर, कांग्रेस का चुनाव प्रभारी सलमान खुर्शीद को बनाया गया है। पार्टी ने ये फैसला भी देर में लिया और बृहस्पतिवार तक प्रभारी नोएडा भी नहीं पहुंचे थे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन चुनावों में कांग्रेस कितनी संजीदा है।
2012 के विधानसभा चुनावों में डॉ. महेश शर्मा को 77319, बसपा से ओमदत्त शर्मा को 49643, सपा से सुनील चौधरी को 42071 और कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. वीएस चौहान को 25482 वोट मिल थे। लेकिन, उपचुनाव 2014 में सभी प्रत्याशी बदले हुए हैं और बसपा प्रत्याशी मैदान में नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन हालात में चुनाव परिणाम किसी के भी पाले में जा सकते हैं। चुनाव विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद सिंह का कहना है कि उपचुनाव में राज्य सरकार को बढ़त हासिल होती है, लेकिन लोकसभा में भाजपा के बेमिसाल प्रदर्शन के बाद कुछ भी कहा नहीं जा सकता है।