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सही मायने में रक्षाबंधन की मिसाल: बहन ने अपना लीवर का हिस्सा देकर बचाई भाई की जान, तीन महीने का ही था वक्त
Thu, 11 Aug 2022 08:33 PM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vikas Kumar
Updated Thu, 11 Aug 2022 08:33 PM IST
सार
डॉक्टरों के मुताबिक, जब मरीज अस्पताल में भर्ती हुआ तो वह कई सारी समस्याओं से पीड़ित था। वह पीलिया, लंबे समय तक रीनल की समस्या, पेट में पानी होने और लीवर फेल के परिणामस्वरूप गंभीर कोगुलोपैथी से पीड़ित था। मोटे होने के अलावा वह पिछले दो से तीन महीने से बहुत ज्यादा बीमार था।
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भाई-बहन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
रक्षाबंधन के पर्व पर एक बहन की ओर से अपने भाई को लीवर का हिस्सा देकर जान बचाने का उदाहरण देखने को मिला है। मरीज लीवर फेल की समस्या से पीड़ित था। यदि समय पर उसे बहन ने मदद नहीं की होती तो उसकी जान भी जा सकती थी। हालांकि, अब 43 वर्षीय बहन और 40 वर्षीय भाई बिल्कुल ठीक हैं।
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आकाश अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, जब मरीज अस्पताल में भर्ती हुआ तो वह कई सारी समस्याओं से पीड़ित था। वह पीलिया, लंबे समय तक रीनल की समस्या, पेट में पानी होने और लीवर फेल के परिणामस्वरूप गंभीर कोगुलोपैथी से पीड़ित था। मोटे होने के अलावा वह पिछले दो से तीन महीने से बहुत ज्यादा बीमार था। इसके अलावा मरीज का खून नहीं जम रहा था, जिस वजह से परिवार बहुत चिंता में था। लीवर की बीमारी की गंभीरता को चिह्नित करने वाले गंभीरता स्तरों के अनुसार, एंड-स्टेज लीवर डिजीज (एमईएलडी) के लिए मरीज का मॉडल स्कोर 30 से ऊपर था। इसका मतलब यह था कि अगर लीवर को तीन महीने में प्रत्योरोपित नहीं किया जाता तो उसकी जान जा सकती थी।
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डॉक्टरों के मुताबिक, मरीज का वजन इतना ज्यादा था कि डॉक्टरों के लिए सर्जरी को अंजाम देना काफी मुश्किल था। वजन की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने बहन के लीवर के दाहिने हिस्से को प्रत्यारोपित करने का फैसला किया, हालांकि भाई के लिए यह हिस्सा बहुत छोटा था। इसके बाद मरीज के मिडिल हेपटिक वेन (मध्य यकृत शिरा) का उपयोग करके लोब बनाने के लिए उपयोग किया गया ताकि मरीज के लीवर में आने वाला प्रवाह पूरी तरह से निकल जाए। इसके बाद स्प्लेनिक आर्टरी (प्लीहा धमनी) को बांध दिया गया। इससे पोर्टल प्रवाह कम हो पाया और मरीज के शरीर में छोटा लीवर पूरी तरह से फिट हो पाया।
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आकाश हेल्थकेयर के डॉ. अजिताभ श्रीवास्तव के मुताबिक, जो मरीज लीवर फेल से पीड़ित है उसे लीवर दान कर एक नई जिंदगी दी जा सकती है। लीवर दान करने में लिंग, उम्र और कोई अन्य चीज मायने नहीं रखती है। मरीज और उसकी बहन की रिकवरी तेजी से हुई व दोनों अब सामान्य हैं।