शाही इमाम के वारिस पर विवाद, मामला हाईकोर्ट में
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दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैयद अहमद बुखारी द्वारा पुत्र को नायब इमाम घोषित करने के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इसमें कहा गया है कि जामा मस्जिद दिल्ली वक्फ बोर्ड की संपत्ति है और इमाम बोर्ड का कर्मचारी। वह अपने पुत्र को किस आधार पर इमाम के पद पर नियुक्त कर सकते हैं?
मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति आरएस एंडला की खंडपीठ के समक्ष याचिका पर बुधवार को सुनवाई होगी। याचिका जामा मस्जिद क्षेत्र निवासी सुहेल अहमद खान ने दायर की है।
इसमें शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के खिलाफ कई आरोप लगाते हुए वक्फ बोर्ड को जामा मस्जिद का कामकाज अपने हाथ में लेने का निर्देश देने की अपील की गई है। सुहेल अहमद खान ने कहा कि सैयद अहमद बुखारी 13वें शाही इमाम हैं। उनकी नियुक्ति 14 अक्तूबर 2000 को हुई थी।
मस्जिद बोर्ड की संपत्ति है और उसे ही इमाम नियुक्त करने का अधिकार: याची
नियुक्ति इस्लामिक तरीके से नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि शाही इमाम अवैध कब्जों, राजनीतिक व कई गैरकानूनी कामों में लगे हुए हैं। हाईकोर्ट व अन्य अदालतों में उनके खिलाफ कई मुकदमे भी विचाराधीन हैं।
जामा मस्जिद को भारतीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित स्मारक घोषित कर रखा है और यह वक्फ बोर्ड की संपत्ति है। इमाम की नियुक्ति का अधिकार बोर्ड को है। ऐसे में शाही इमाम अपने 19 वर्षीय बेटे को नायब इमाम घोषित नहीं कर सकते हैं।
याची ने अदालत से आग्रह किया कि बोर्ड को जामा मस्जिद के प्रशासन का कामकाज अपने हाथों में लेने का निर्देश देते हुए इमाम द्वारा किए गए कब्जों व अन्य कामों की सीबीआई से जांच करवाने का निर्देश दिया जाए।