डीटीसी बस हड़ताल का 7वां दिन: यात्रियों की जेब पर पड़ रहा भारी असर, महीने का बिगड़ा बजट; क्या कह रही आम जनता?
दिल्ली में बस चालकों की हड़ताल को लगभग एक सप्ताह पूरा होने वाला है। इसका सीधा असर यात्रियों की जेब पर पड़ रहा है, खासकर बस पास धारकों पर। यात्री सुनील ने बताया कि महीनेभर का पास इसलिए बनवाया था ताकि रोज अलग से किराया न देना पड़े।
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महीनेभर का बस पास जेब में है। पास की अवधि भी खत्म नहीं हुई है, लेकिन बसें सड़कों से गायब हैं। ऐसे में दफ्तर, दुकान या काम पर पहुंचने के लिए रोज जेब से अलग किराया देना पड़ रहा है। दिल्ली में बस चालकों की हड़ताल को एक सप्ताह पूरा होने को है और इसका असर अब सिर्फ बस स्टैंड पर लंबे इंतजार तक सीमित नहीं रह गया है। अमर उजाला की लाइव पड़ताल में बुधवार को हड़ताल का सीधा असर यात्रियों की जेब पर दिखाई दिया।
बस स्टैंड और टर्मिनल पर यात्री निर्धारित रूट की बस के इंतजार में खड़े रहे। कोई 10-15 मिनट तक सड़क की ओर देखता रहा तो कोई मोबाइल पर बस की लोकेशन या अगली सवारी तलाशता नजर आया। इंतजार लंबा हुआ तो कई यात्रियों ने ऑटो, कैब और रैपिडो का सहारा लिया। सबसे ज्यादा परेशानी उन यात्रियों को दिखी, जिन्होंने महीनेभर के सफर का खर्च पहले ही बस पास के रूप में चुका दिया है।
बस पासधारकों की परेशानी यह है कि पास के पैसे वापस नहीं मिल रहे और सेवा उपलब्ध नहीं होने के कारण उसका इस्तेमाल भी नहीं हो पा रहा। रोजाना काम पर जाना जरूरी है, इसलिए बस के बजाय दूसरे साधन लेने पड़ रहे हैं। यानी एक ही सफर के लिए यात्री पहले पास का भुगतान कर चुका है और अब उसी यात्रा के लिए रोज अतिरिक्त रकम खर्च कर रहा है।
पहले तय था महीने का बजट, अब रोज का हिसाब
मनीष के मुताबिक, नियमित यात्रियों के लिए बस पास का सबसे बड़ा फायदा यही होता है कि महीनेभर के सफर का खर्च पहले से तय रहता है। हड़ताल ने यह गणित बिगाड़ दिया है। पास जेब में है, लेकिन सफर का खर्च फिर भी रोज निकल रहा है। यही स्थिति लंबे रूट पर सफर करने वाले यात्रियों की भी है। बस नहीं मिलने पर वे पहले ऑटो, कैब या रैपिडो से मेट्रो स्टेशन अथवा किसी कनेक्टिंग प्वाइंट तक पहुंच रहे हैं। इसके बाद मेट्रो या दूसरे सार्वजनिक साधन से आगे जाना पड़ रहा है। ऐसे में जिस यात्रा में पहले एक बस से काम चल जाता था, अब उसके लिए दो या तीन साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
स्टैंड पर इंतजार से मोबाइल पर बुकिंग तक
बुधवार को पड़ताल के दौरान बस स्टैंड पर तस्वीर साफ थी। यात्री बस के आने का इंतजार करते रहे। कुछ देर बाद जब कोई बस नजर नहीं आई तो मोबाइल निकले और वैकल्पिक साधन तलाशे जाने लगे। किसी ने रैपिडो बुक की तो कोई कैब का किराया देखता नजर आया। कई यात्री ऑटो की तलाश में सड़क की ओर निकल गए।
यात्रियों की शिकायत है कि हड़ताल के शुरुआती दिनों में परेशानी का केंद्र बस का इंतजार था। अब एक सप्ताह पूरा होने के साथ सफर जेब पर भारी होता जा रहा है। हर दिन वैकल्पिक सवारी करना मुश्किल है। यात्रियों की समस्या सिर्फ यह नहीं कि उन्हें बस नहीं मिल रही। उनका सवाल है कि जिस सफर के लिए वे पहले ही महीनेभर का भुगतान कर चुके हैं, उसी सफर के लिए उन्हें रोज अपनी जेब क्यों ढीली करनी पड़ रही है? हड़ताल जितनी लंबी खिंचेगी, नियमित बस यात्रियों के घरेलू यात्रा बजट पर इसका असर उतना ही बढ़ता जाएगा।
यात्री सुनील ने बताया कि महीनेभर का पास इसलिए बनवाया था ताकि रोज अलग से किराया न देना पड़े। अब बस नहीं मिल रही है तो दफ्तर जाने के लिए ऑटो या रैपिडो लेना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, पास का खर्च अपनी जगह है और रोज का किराया अलग से जेब पर पड़ रहा है।
राकेश ने बताया कि पहले बस से सीधे काम की जगह तक पहुंच जाते थे। अब पहले बस का इंतजार करना पड़ता है और जब बस नहीं आती तो मजबूरी में दूसरा साधन लेना पड़ता है। इससे समय भी जा रहा है और रोजाना यात्रा का बजट भी बिगड़ रहा है।