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रोडवेज डिपो में छिपा है करोड़ों का घोटाला, कॉमनवेल्थ खेलों से भी जुड़े है तार

Tue, 19 Jul 2016 09:00 AM IST
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Tue, 19 Jul 2016 09:00 AM IST
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Roadways depot hidden in the billions scam, Commonwealth Games, is also associated with the wire
हरियाणा रोडवेज बस - फोटो : ‌file photo

छह साल पहले तत्कालीन सरकार की बस खरीद योजना पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री ने बस खरीद मामले की जांच कराने का बयान देकर परिवहन निगम में हलचल पैदा कर दी है। 

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फरीदाबाद डिपो में 150 लो फ्लोर बसों में से अधिकांश जर्जर हो चुकी हैं, जबकि करीब छह साल पहले ही इनकी खरीद हुई थी। रोडवेज सूत्रों की मानें तो तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में हुई बस खरीद का रिकॉर्ड खंगालने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 
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माना जा रहा है कि जांच में यदि खरीद के दौरान गड़बड़ी पाई गई तो कई अधिकारी व राजनेता फंस सकते हैं। परिवहन मंत्री के जांच कराए जाने के बयान का हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन ने भी समर्थन किया है। 
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दरअसल, 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान केंद्र सरकार ने देश के अलग-अलग राज्यों को जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) के अंतर्गत लो-फ्लोर बसें मुहैया कराई थीं। 

इस दौरान फरीदाबाद नगर निगम को भी 150 बसें दी गईं, जिनके संचालन का जिम्मा हरियाणा रोडवेज को दिया गया। इन बसों की खरीद में केंद्र सरकार ने 80 प्रतिशत और राज्य सरकार ने 20 प्रतिशत राशि दी थी।

150 बसों में अशोक लीलैंड कंपनी की 85 लो-फ्लोर(नॉन एसी) बसें, 30 लो-फ्लोर(एसी) बसें, 15 वोल्वो और 20 स्वराज मिनी बसें शामिल थीं। जिनकी कीमत करीब 53 करोड़ आंकी जा रही है। 

कॉमनवेल्थ की आपाधापी में खरीदी गई बसों को बिना संचालन की प्लानिंग के ही खरीदने की बात सामने आ रही है। क्योंकि जब बसें खरीदी गई तब न रोडवेज के पास पर्याप्त ड्राइवर थे और न ही कंडक्टर। जिसके चलते दो साल तक बसें डिपो में खड़ी खड़ी जर्जर हो गई। 53 करोड़ की इस योजना का जो लाभ जनता को मिलना चाहिए था वो नहीं मिल सका। 

रोडवेज वर्कर्स यूनियन ने परिवहन मंत्री के बयान का किया समर्थन

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हरियाणा रोडवेज - फोटो : अमर उजाला
क्या थी योजना 
लो-फ्लोर बसों को लेकर 2009 में सिटी बस सेवा की शुरुआत की गई थी। उस समय 18 बसों के साथ इस योजना को शुरू किया गया था। शहर में सिटी बस सेवा के लिए रूट तय किए गए थे। 

मगर परिवहन विभाग की कमियों के कारण यह योजना सिरे नहीं चढ़ सकी। मौजूदा हाल में सिटी बस सेवा दम तोड़ने के कगार पर है। परिवहन विभाग सिटी बस सेवा को 17 रूटों में से मात्र 8 पर ही चला पा रहा है। फिलहाल 150 सिटी बसों में से केवल 85 बसें ही ऑन रूट हैं। 

कंपनी को मिला अप्रत्यक्ष लाभ
इसे दुर्भाग्य कहें या भ्रष्ट तंत्र की लापरवाही। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद ये बसें 50 हजार किलोमीटर का आंकड़ा भी नहीं छू पाईं, जबकि नियमानुसार 10 लाख किलोमीटर चलने के बाद बस को कंडम घोषित किया जाता है। 

डिपो में खड़ी बसों की सीटों से आज भी पन्नी नहीं उतर पाई है। कई बसें तो स्टाफ न होने के कारण दो साल तक डिपो से बाहर ही नहीं निकल पाई। जिसके कारण बसों का वारंटी पीरियड निकल गया। कंपनी ने वारंटी पीरियड में एक भी बस को ठीक नहीं की। जिससे कंपनी को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचा गया। 

बसों की खरीद में प्रदेश स्तर पर सांठगांठ स्पष्ट दिखाई देती है। जब डिपो में चालक और परिचालकों की भर्ती ही नहीं हुई थी तो इतनी मंहगी बसों को क्यों खरीदा गया। बार-बार शिकायत करने के बावजूद सरकार ने स्टाफ की भर्ती क्यों नहीं की?
-जितेंद्र धनखड़, (डिपो प्रधान) हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन

परिवहन मंत्री का बयान स्वागत योग्य है। कर्मचारी शुरुआत से ही बसों की खरीद में पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाना मान रहे हैं। अब सरकार मान रही है, तो अच्छा है। हालांकि भाजपा सरकार की कथनी-करनी में अंतर है। जांच होगी या नहीं, इस पर अंदेशा है। 
-रामआसरे, प्रदेश सचिव हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन  
 
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