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Delhi NCR News: नाम से सर्च करने पर नहीं दिखेंगे पुराने मुकदमों के रिकॉर्ड
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दिल्ली हाईकोर्ट ने मजबूत किया ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’
बरी, डिस्चार्ज, समझौते या केस रद्द होने की स्थिति में मिलेगा लाभ, सार्वजनिक हित और दोषसिद्धि वाले मामलों में नहीं मिलेगी राहत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (भुला दिए जाने का अधिकार) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि गूगल और अन्य सर्च इंजन किसी व्यक्ति के नाम से सर्च करने पर उन मामलों से जुड़े न्यायिक रिकॉर्ड, फैसले या समाचार नहीं दिखा सकते, जिनमें वह बरी हो चुका हो, डिस्चार्ज हो गया हो, मामला रद्द (क्वैश) हो गया हो या समझौते के आधार पर समाप्त हो गया हो।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने 30 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 144 पृष्ठों का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि न्यायिक पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी व्यक्ति की गोपनीयता, गरिमा और प्रतिष्ठा को अनावश्यक नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
इन परिस्थितियों में मिलेगा लाभ
- अदालत ने कई याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश देते हुए संबंधित न्यायिक आदेशों, फैसलों और समाचारों को नाम-आधारित सर्च से डी-इंडेक्स करने का निर्देश दिया।
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-गूगल और अन्य सर्च इंजनों को दो सप्ताह के भीतर आदेश का पालन करना होगा।
- डी-इंडेक्सिंग का अर्थ है कि व्यक्ति का नाम सर्च करने पर संबंधित सामग्री दिखाई नहीं देगी। हालांकि, केस नंबर, साइटेशन या अन्य विशिष्ट माध्यमों से रिकॉर्ड उपलब्ध रहेंगे।
-अदालत ने कहा कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सूचना संबंधी गोपनीयता का हिस्सा है।
-यदि किसी पक्षकार की मृत्यु के कारण मामला समाप्त हो गया हो और उसके परिवार को नुकसान हो रहा हो, तो भी डी-इंडेक्सिंग की मांग की जा सकती है।
-संबंधित व्यक्ति अदालत से फैसले में अपना नाम छिपाने (मास्क करने) की अनुमति भी मांग सकता है।
इन मामलों में नहीं मिलेगा लाभ
-महिलाओं या बच्चों के खिलाफ अपराधों में दोषसिद्धि
- लोक विश्वास भंग करने वाले अपराध
- सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से जुड़े अपराध
-सार्वजनिक हित से जुड़े मामले
इन याचिकाकर्ताओं को नहीं मिली राहत
अदालत ने रियलिटी शो सेलिब्रिटी आशुतोष कौशिक और पीपी माधवा की याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में जनहित बना रहता है, इसलिए ऐसे मामलों में डी-इंडेक्सिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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बरी, डिस्चार्ज, समझौते या केस रद्द होने की स्थिति में मिलेगा लाभ, सार्वजनिक हित और दोषसिद्धि वाले मामलों में नहीं मिलेगी राहत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (भुला दिए जाने का अधिकार) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि गूगल और अन्य सर्च इंजन किसी व्यक्ति के नाम से सर्च करने पर उन मामलों से जुड़े न्यायिक रिकॉर्ड, फैसले या समाचार नहीं दिखा सकते, जिनमें वह बरी हो चुका हो, डिस्चार्ज हो गया हो, मामला रद्द (क्वैश) हो गया हो या समझौते के आधार पर समाप्त हो गया हो।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने 30 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 144 पृष्ठों का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि न्यायिक पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी व्यक्ति की गोपनीयता, गरिमा और प्रतिष्ठा को अनावश्यक नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
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इन परिस्थितियों में मिलेगा लाभ
- अदालत ने कई याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश देते हुए संबंधित न्यायिक आदेशों, फैसलों और समाचारों को नाम-आधारित सर्च से डी-इंडेक्स करने का निर्देश दिया।
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-गूगल और अन्य सर्च इंजनों को दो सप्ताह के भीतर आदेश का पालन करना होगा।
- डी-इंडेक्सिंग का अर्थ है कि व्यक्ति का नाम सर्च करने पर संबंधित सामग्री दिखाई नहीं देगी। हालांकि, केस नंबर, साइटेशन या अन्य विशिष्ट माध्यमों से रिकॉर्ड उपलब्ध रहेंगे।
-अदालत ने कहा कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सूचना संबंधी गोपनीयता का हिस्सा है।
-यदि किसी पक्षकार की मृत्यु के कारण मामला समाप्त हो गया हो और उसके परिवार को नुकसान हो रहा हो, तो भी डी-इंडेक्सिंग की मांग की जा सकती है।
-संबंधित व्यक्ति अदालत से फैसले में अपना नाम छिपाने (मास्क करने) की अनुमति भी मांग सकता है।
इन मामलों में नहीं मिलेगा लाभ
-महिलाओं या बच्चों के खिलाफ अपराधों में दोषसिद्धि
- लोक विश्वास भंग करने वाले अपराध
- सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से जुड़े अपराध
-सार्वजनिक हित से जुड़े मामले
इन याचिकाकर्ताओं को नहीं मिली राहत
अदालत ने रियलिटी शो सेलिब्रिटी आशुतोष कौशिक और पीपी माधवा की याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में जनहित बना रहता है, इसलिए ऐसे मामलों में डी-इंडेक्सिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती।