बच्चों की दुआओं से मिला नोबेल: सत्यार्थी
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शांति का नोबेल पुरस्कार ग्रहण कर देश लौटे कैलाश सत्यार्थी के चेहरे पर मुस्कान थी और दुनिया के हर बच्चे का बचपन लौटाने का निश्चय। रविवार को मीडिया से रूबरू सत्यार्थी कई मौके पर पुरस्कार को लेकर भावुक दिखे, तो कई बार लगा कि वे अपने आंदोलन को लेकर अब और दृढ़ हो गए हैं। सत्यार्थी ने कहा, ‘जब तक प्रत्येक बच्चा आजाद न हो जाए, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगा। जल्द ही यह चाइल्ड लेबर इतिहास में पढ़ा जाएगा। दुनिया में चाइल्ड लेबर देखने को भी नहीं मिलेगा।’
नार्वे के ओस्लो सिटी हॉल में पुरस्कार लेते समय जो कुछ भाव मन में थे, उसे साझा करते हुए कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि मंच पर कई सारी बातें याद आ रही थीं। सबसे पहले महात्मा गांधी याद आए। बापू जिंदा होते तो सबसे पहले वे इस पुरस्कार के हकदार होते। मेरी नजर में महात्मा गांधी की सबसे बड़ी भूमिका आध्यात्म को आंदोलन में बदलने की थी। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को उन्होंने आंदोलन बनाया। आज लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि भारत ने आपको क्या दिया। मैं यही कह रहा हूं कि मैं जो कुछ भी हूं, भारत की वजह से हूं। भारत ने ही मुझे पूरा परिवार दिया।
सत्यार्थी ने कहा कि नोबेल पुरस्कार की घोषणा के दिन से ही नैतिक जिम्मेदारी का बोझ बढ़ता जा रहा है। सभी से निवेदन है कि जहां भी बच्चों पर जुर्म होता देखें, वहीं आवाज उठाएं। संकल्प लें कि मासूमियत कुचली नहीं जाए।
बिना रोशनी वाली कोठरी से मिली ताकत
सत्यार्थी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की वजह से बिना संसाधनों के भी लोग अपना काम कर सकते हैं। मीडिया ने अज्ञात बच्चों को आवाज दी, जिसके लिए आभारी हूं। गांधी के उस मंत्र को याद करने की आवश्यकता है, जिसमें उन्होंने नेहरू से कहा था कि कोई भी कानून बनाते समय दुनिया के सबसे दबे-कुचले को ध्यान में रखें।
उन्होंने कहा कि पुरस्कार की राशि से मेरे बच्चे एक कप चाय भी नहीं पीएंगे। यह राशि भारत और दुनिया के बच्चों के लिए होगी। बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़े लोगों को भी इस राशि का रत्ती भर नहीं मिलेगा। मैं देश की संसद से अपील करता हूं कि बाल मजदूरी से देश को मुक्ति दिलाएं। कोई भी बच्चा मजदूरी न करे, इस कानून को जरूर पारित करें।
अपने अतीत को याद करते हुए सत्यार्थी ने कहा कि बिहार, मिर्जापुर और राजस्थान में जब बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने जाता था, तो पत्नी परेशान रहती थीं। घर में बेटे को पीने के लिए दूध नहीं होता था। कई साल स्टोर रूम जैसे कमरे में रहने को मजबूर होना पड़ा, जिसमें रोशनी भी नहीं आती थी। उससे मुझे ताकत मिली। जब मैं इस मुहिम में जुटा तो सभी ने मना किया। दोस्त मजाक उड़ाते थे, लेकिन मैंने बच्चों की खुशी से समझौता नहीं किया।