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'तू चला वन को मेरी जान पे बन आई है...'

Wed, 01 Oct 2014 05:07 AM IST
Updated Wed, 01 Oct 2014 05:07 AM IST
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raleela and indian culture by classical music.

पॉप, रॉक , रैप, जैज जैसे आधुनिक म्यूजिक के जमाने में एक नंबर की विजय रामलीला शास्त्रीय संगीत के जरिए भारतीय कला और संस्कृति को जिंदा रखे हुए है।

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यहां रामजी, सीताजी, अंगद, हनुमान, रावण या कोई और पात्र संवादों को राग में अदा करते हैं। यही वजह है कि इस रामलीला में शास्त्रीय संगीत के शौकीन तो आते ही हैं, संस्कृति का ज्ञान पाने के लिए नई पीढ़ी भी यहां जुटती है।
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विजय रामलीला कमेटी की ओर से करीब 63 साल से आयोजित हो रही रामलीला शहर में शास्त्रीय संगीत का पर्याय बन चुकी है। खास बात यह है कि पात्रों के संवाद तो हर वर्ष एक ही रहते हैं लेकिन उनकी अदायगी का ढंग बदल जाता है।

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आंखों से बहते आंसू और तालियां

raleela and indian culture by classical music.

कलाकार कभी शिवरंजनी, भीम पलासी तो कभी अहीर भैरव, दरबारी, पीलू, जैसे राग और कहरवा, तीन ताल, झपकताल, दादरा जैसी ताल की संगत में संवाद अदा करते हैं। शास्त्रीय संगीत से गुंथी हुई रामलीला दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

पिछले 47 वर्ष से रामलीला को यह रूप संगीतकार नौशाद के शागिर्द रहे संचालक विश्वबंधु शर्मा देते आ रहे हैं। रामलीला और संगीत से उनके से जुड़ाव का यह हाल है कि राग की सरगम गुनगुनाते हुए संवाद तैयार कर देते हैं। निर्देशक कहते हैं कि उनकी मेहनत का ईनाम भाव विभोर हुए दर्शकों की आंखों से बहते हुए आंसू और तालियां होती हैं।

प्राण आंखों में आपसे मेरे, हे नाथ अब तो आ जाओ!!!
सारी गलियां अवध की पूछेंगी अपनी सीता को कहां छोड़ दिया,
शिव धनुष तोड़कर जो बांधा था वो ही बंधन बताओ तोड़ दिया।
(राग शिवरंजनी)

मेरी जान पे बन आई है...

raleela and indian culture by classical music.
भरी दुनिया में मेरे भाग में तन्हाई है,
आज ममता के लिए कैसी घड़ी आई है।
तू चला वन को मेरी जान पे बन आई है...।।
(राग भीम प्लासी)

दिन कभी ऐसे आएंगे मालूम न था,
एक-एक करके बिछड़ जाएंगे मालूम न था।
ये जमीं वैसी है, ये तारें वैसे ही हैं
ये जहां वैसा है, सारे नजारे वैसे ही हैं
आशियां अपने उजड़ जाएंगे मालूम न था
(राग अहीर भैरव)
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