बिना इस रेलवे स्टेशन के अधूरी है भाग मिल्खा भाग की कहानी
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प्रधानमंत्री मोदी के बुलेट प्रोजेक्ट के काल में भले ही हाईतकनीकी से लैस रेलवे लाइन बिछाने की तैयारी शुरू हो गई हो। लेकिन राजधानी से एनसीआर में आज भी देश की दूसरी रेल लाइन ब्रिटिशकाल की याद दिलाती है।
अंग्रेजी हुकुमत से लेकर देश के आजाद होने बाद भी। इसी लाइन से राजधानी में व्यापारिक दृष्टि से आज भी आवाजाही की जा रही है।
देश में संविधान बनने के दशकों बाद रेलबजट की पंरपंरा में अमर उजाला ऐसे ही पुराने रेलवे स्टेशनों के उन इतिहास को पेश कर रहा है। जिन्हें शायद सरकार भी भूल गई हो। पेश है विशेष रिपोर्ट...
यूं पड़ा फूलों वाली ट्रेन नाम
मीटर गेज में शुरू हुई ट्रेन को रेलवे लाइन चौड़ीकरण के चढ़ते रोक दिया गया। काफी संघर्ष के बाद गत वर्ष यहां ट्रेन का संचालन करते हुए इस लाइन को फिर से मुख्यधारा में लाने की कोशिश की गई है।
दैनिक रेलयात्री संघ फर्रूखनगर-सुल्तानपुर के संस्थापक बीआर सारवान के मुताबिक यहां से गेंदा, जाफरी समेत कई फूलों की खेती होती है। प्रतिमाह करीब 30 लाख रुपये का फूलों का व्यापार होता है।
हाल ही की चर्चित फिल्म भाग मिल्खा भाग में भी फर्रूखनगर स्टेशन को दिखाया गया है इससे पहले भी यहां पर महात्मा गांधी पर फिल्माई गई गांधी नामक फिल्म की शूटिंग हो चुकी है।
गांव के बुजुर्ग चाचा रामपाल ने बताते है कि स्टेशन से एकमात्र फर्रूखनगर-दिल्ली सराय रोहिल्ला डीएमयू चलती है। स्टेशन की इमारत जर्जर हो गई है। सरकार इस तरफ ध्यान दे तो यह स्टेशन से फिर से जीवंत हो सकता है।
ग्रामीणों का बनाया देश का पहला हॉल्ट स्टेशन
गुड़गांव-रेवाड़ी रेलखंड के मध्य आने वाले गुड़गांव जिले के ताजनगर रेलवे स्टेशन का इतिहास भी शानदार रहा है। इसे देश का पहला रेलवे हॉल्ट कहा जाता है जिसे ग्रामीणों ने अपने स्तर पर आर्थिक सहयोग कर बनाया था।
हॉल्ट की इमारत के निर्माण खर्च के बाद यहां पर रेलवे की तय नियम-शर्तो के मुताबिक पांच लाख रुपये की टिकट खरीद यहां भारतीय रेलवे से ट्रेनों का ठहराव सुनिश्चित कराया। ग्रामीणों के सहयोग के बाद फिलहाल यहां पर चार पैसेंजर ट्रेनों का ठहराव होता है।
स्टेशन का प्राचीन मंदिर दिलाता है गुजरे जमाने की याद
गुड़गांव रेलवे स्टेशन के परिसर में बना प्राचीन मंदिर यहां के गुजरे जमाने की याद दिलाता है। जानकारों के मुताबिक शीतला माता मंदिर के दौरान से ही इस मंदिर की मान्यता है।
दूरदराज से आने वाले श्रृद्धालु पहले इस मंदिर में मत्था टेक प्रसाद चढ़ाते है उसके बाद माता के दर्शन करते है। मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन से ही मां शीतला के दर्शनों की पूर्ण प्राप्ति होती है।