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कहीं ये यंग इंडिया का उभरता अन्ना तो नहीं!

Sat, 18 Apr 2015 02:10 AM IST
Updated Sat, 18 Apr 2015 02:10 AM IST
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Profile of Devansh Mehta and his fight for justice in st. Stephan's

लड़कियों के हॉस्टल में जाने का रास्ता रात दस बजे के बाद भी खुला रहना चाहिए या नहीं? देवांश चाहते थे कि इस पर बहस हो और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाए। कॉलेज के प्रिंसिपल ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया जिसे लेकर देवांश और उनके प्रिंसिपल के बीच मनमुटाव हो गया।

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जिनके बारे में फैसला लिया जा रहा है पहले उनसे बात की जाए और ऐसा न होने पर उसके खिलाफ आवाज उठाई जाए। देवांश यही सोच रखते हैं। तभी तो जब उनके बारे में अनुशासनात्मक कार्यवाही करने से पहले प्रिसिंपल ने उनका पक्ष सुने बिना फैसला सुनाया तो देवांश ने प्रिंसिपल के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खड़खड़ा दिया।
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असल में वाल्शन थंपू दिल्ली के प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस के प्रिंसिपल हैं और देवांश उन्हीं के कॉलेज में फिलॉसफी ऑनर्स के स्टूडेंट हैं और अब प्रिंसिपल और स्टूडेंट कोर्ट में होने वाली जिरह के लिए आमने सामने होंगे।
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बता दें कि देवांश को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इनवेस्टिगेटिव जर्नलिजम कोर्स में दाखिला मिल गया है और जल्द ही जाने वाले हैं।

क्यों चर्चा में आए देवांश

Profile of Devansh Mehta and his fight for justice in st. Stephan's

असल में देवांश ने हाल ही में अपने प्रिंसिपल वाल्‍शन थंपू का एक इंटरव्यू किया और कॉलेज की इ-मैगजीन में उसे छाप दिया। इस बात पर प्रिंसिपल उससे नाराज हो गए और देवांश को सस्पेंड कर दिया।

देवांश शांत नहीं बैठे और अपने प्रिंसिपल की इस कार्यवाई को कोर्ट में चुनौती दे दी। शुक्रवार को दिल्ली की अदालत में इस मामले की सुनवाई है और यह तय किया जाना है कि एक छात्र के प्रति प्रिंसिपल की यह कार्यवाई कितनी उचित है।

असल में देवांश अपने प्रिसिंपल से हुए इस टकराव के चलते फिलहाल अपने कॉलेज के साथ-साथ्‍ा देश भर की मीडिया में भी चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

पिता से मिली अकेले लड़ने की ताकत

Profile of Devansh Mehta and his fight for justice in st. Stephan's

देवांश बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली छात्र रहे हैं। मुंबई के सेंट मैरी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए देवांश दिल्ली आ गए।

देवांश एक बिजनेस फैमिली से संबंध रखते हैं लेकिन उनके पिता ने तमाम विरोधों के बावजूद अपने पारिवारिक धंधे को छोड़ने का फैसला किया और वित्तीय सलाहकार बनने का अपना सपना पूरा करने के लिए निकल पड़े।

अपने पिता से उन्होंने एक बात सीखी है कि अगर आप सही हैं तो आपको अपने समर्थन के लिए किसी भीड़ के सहयोग की जरूरत नहीं है। और अकेले होते हुए भी आपको किसी से डर कर कोई काम नहीं करना चाहिए।

आगरा में किया अनोखा प्रयोग

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देवांश की मां भी एक उद्यमी हैं और कपड़े का व्यापार करती हैं। अपनी मां से देवांश ने सीखा है कि कभी भी उत्तेजित नहीं होना चाहिए और न ही उत्तेजना में कोई फैसला लेना चाहिए।

देवांश की उम्र 21 साल है और अपने अब तक के सफर में वह 69.62% अंकों के साथ सेंट स्टीफेंस के फिलॉसफी ऑनर्स के तीन सबसे उम्दा छात्रों में शामिल हैं।

देवांश की रचनात्मकता और संवेदनशीलता का पता इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक बार जब वह अपने दोस्तों के साथ आगरा घूमने गए तो एक अनोखा प्रयोग कर डाला।

केजरीवाल से की मदद की गुहार

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आगरा में अपने दोस्तों के साथ वह एक मेंटल हॉस्पिटल गए। यह देखने के लिए ‌कि लोग ऐसे मरीजों के प्रति कितने संवेदनशील हैं देवांश ने सड़क पर बेहोश होने का नाटक किया। ऐसा ही एक टेस्ट उन्होंने श्रीनगर में भी किया जहां एक दुकानदार ने उनकी मदद के लिए व्यस्त समय में अपनी दुकान बंद कर उनकी मदद की।

अशक्त लोगों की मदद के लिए देवांश दिल्ली मेट्रो में भी ऐसा काम कर चुके हैं। शनिवार को देवांश के कॉलेज में ग्रेजुएशन सेरेमनी है और प्रिंसिपल द्वारा सस्पेंड होने की वजह से वह इसमें भाग नहीं ले सकते।

हालांकि अपने दोस्तों और टीचर्स के पसंदीदा होने के कारण कुछ लोगों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से इस मामले में हस्तक्षेप करने और देवांश की मदद करने की गुहार लगाई है।

गर्व की बात ये है कि देवांश को कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इनवेस्टिगेटिव जर्नलिजम में पढ़ने के लिए एक्सेपटेंस भी मिल चुका है लेकिन उनकी सारी खुशियों पर उनके प्रिंसिपल वाल्‍शन थंपू के आदेश की वजह से ग्रहण लगा हुआ है। देखते हैं कि न्याय और अपने हक की लड़ाई में देश की अदालत से इस युवा को कितनी मदद मिलती है।

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