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पहली बार जनता कर्फ्यू का हुआ सकारात्मक प्रयोग, इस बार कोई विरोध नहीं
Mon, 23 Mar 2020 05:29 AM IST
दुष्यंत शर्मा
नवनीत शरण, नई दिल्ली
नवनीत शरण, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 23 Mar 2020 05:29 AM IST
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जनता कर्फ्यू
- फोटो : अमर उजाला
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जनता कर्फ्यू तो पहले भी लगता था, लेकिन इस तरह का कर्फ्यू सिर्फ विरोध के लिए होता था। देश में पहली बार इसका प्रयोग सकारात्मक किया गया। सेवा करने वालों के सम्मान में किया गया और देशवासियों ने इसका समर्थन किया। आपातकाल में आह्वान जरूर किया गया, लेकिन इसका असर नहीं हुआ था।
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जनता कर्फ्यू यूं तो आजादी की मांग को लेकर और आजादी के बाद संपूर्ण क्रांति के वक्त गुजरात और दिल्ली में भी हुआ, लेकिन यह सत्ता के विरोध में हुआ था। दिल्ली के तिहाड़ में भी इस तरह का कर्फ्यू राजनीतिक बंदियों ने किया था। जब जोर-जोर से थाली पीटी गई थी।
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समाजसेवी धर्मवीर शर्मा कहते हैं कि जनता कर्फ्यू गुजरात और जेपी आंदोलन के समय में भी हुआ था, लेकिन सम्मान में जनता कर्फ्यू पहली बार देखने को मिला। टकराव सत्ता से नहीं था, बल्कि देशहित में था। उस समय इस तरह के कर्फ्यू लगाने वालों को सरकार की नजर में गदर समझा जाता था।
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शर्मा बताते हैं कि जुलाई 1975 में तिहाड़ में यह प्रयोग आपातकाल के विरोध में हुआ था। बंदियों को सी ग्रेड के वार्ड में रखा गया था। इसी के खिलाफ बंदियों ने जमकर थाली बजाकर जेल प्रशासन के विरोध में किया। हालांकि, उस दौरान जेल प्रशासन ने अन्य कैदियों को खुला छोड़ दिया।
कैदियों ने राजनीतिक कैदियों की जमकर पिटाई करवाई। किसी के हाथ टूटे तो किसी सिर फटा। बाद में यह मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया। इसके बाद ही अदालत ने यह आदेश दिया कि राजनीतिक बंदियों को बी-क्लास का वार्ड दिया जाए। इस प्रोटेस्ट का लाभ मिला।
गुजरात में इसका प्रयोग छात्र नेता महेश जॉनी ने 1974 में किया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ थाली और शंख बजाकर आंदोलन किया। यह भी विरोध में हुआ था। पाकिस्तान के बादशाहपुर से आए मोहनलाल बताते हैं कि इस तरह का प्रयोग पहली बार देखने को मिला। राजनीतिक लोग ही जनता कर्फ्यू करते थे। इस बार थाली बजाना जबरदस्ती नहीं रहा, चौकस रहने के लिए लोगों ने किया। सकारात्मक प्रयोग पहली बार किया।