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पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर एक बार फिर राजनीति शुरू

Fri, 22 Feb 2019 05:48 AM IST
राजेश सैनी विजय सिंघल, नई दिल्ली
विजय सिंघल, नई दिल्ली Published by: राजेश सैनी Updated Fri, 22 Feb 2019 05:48 AM IST
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Politics start once again in Delhi to demand full state status
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल - फोटो : अमर उजाला

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग पर राजनीति शुरू हो गई है। आप ने जनता के बीच जाने व पुन: आंदोलन करने की रणनीति तैयार की है। वहीं भाजपा व कांग्रेस आप पर काम की अपेक्षा इस मुद्दे पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगा रहे हैं। सवाल उठता है कि भाजपा व कांग्रेस केंद्र में अपनी सरकार होने के बावजूद दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिलवा पाई तो आप कैसे लड़ाई में कामयाब होगी। वो भी तब जब उसका केंद्र से छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है।

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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कोई नई नहीं है। 1993 में जब दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी तब मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने इस मुद्दे पर आवाज उठाई। उनके बाद साहिब सिंह वर्मा ने आवाज बुलंद की। उनका मानना था कि पूर्ण राज्य न होने के कारण दिल्ली का विकास नहीं हो रहा। हर काम के लिए केंद्र की ओर मुंह ताकना पड़ता है।
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15 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित भी इस मांग पर केंद्र से टकराव लेती रही हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार रही हो या फिर कांग्रेस की, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से कतराती रही है। यह अलग बात है कि चुनावों में दोनों ही पार्टियां इस मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में शामिल करती रही हैं।

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पूर्ण राज्य का दर्जा देने में समस्या व टकराव की संभावना
दरअसल दिल्ली का बुनादी ढांचा ही ऐसा है कि इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने से कई समस्याएं व टकराव की संभावना ज्यादा नजर आती हैं। इसी के चलते हर बार यह मांग दबकर रह जाती है। दिल्ली देश की राजधानी है और संसद से लेकर सभी केंद्रीय कार्यालय, विभिन्न देशों के दूतावास, उनके निवास स्थान दिल्ली में ही है।

कई बार आवाज उठी कि नई दिल्ली पालिका परिषद क्षेत्र को दिल्ली से अलग रखकर अन्य क्षेत्र की दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया जाए।  एनडीएमसी क्षेत्र को अलग करने से भी इस समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा। 

विश्वभर के दूतावास व अधिकारियों के सुरक्षा का जोखिम
यदि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया जाता है तो कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर होगी, लेकिन केंद्र सरकार किसी भी हालत में विश्वभर के दूतावास व उनके अधिकारियों की सुरक्षा का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। दूतावास व उनके अधिकारियों के निवास मात्र एनडीएमसी क्षेत्र में ही नहीं अन्य इलाकों में भी है। ऐसे में कुछ भी घटना होने पर पूरे विश्व में देश का नाम खराब होगा।

अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार क्षेत्र भी बड़ा विवाद
अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर भी अधिकार क्षेत्र भी विवाद रहा है। वहीं पुलिस राज्य सरकार के अधीन करने से दोनों सरकारों के बीच टकराव की स्थिति कभी भी हो सकती है। यही कारण है कि केंद्र कानून व्यवस्था की आड़ लेकर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से बचती रही है। 

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