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शीला दीक्षित के निधन के बाद दिल्ली में सियासी हलचल तेज, कांग्रेस में फूट से भाजपा खेमा परेशान
Tue, 23 Jul 2019 09:23 PM IST
शाहरुख खान
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 23 Jul 2019 09:23 PM IST
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फाइल फोटो
पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन के बाद कांग्रेस एक बार फिर कमजोर दिखने लगी है। शीला दीक्षित के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव के दौरान कार्यकर्ता पूरे जोश में थे, लेकिन अब इसमें कमी आ गई है। नेतृत्व संकट भी सामने है।
इससे दिल्ली में राजनीतिक समीकरण भी बदला है। इसके मद्देनजर विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा परेशान है। उधर, आप अभी से गुणा-भाग में जुट गई है।
दिल्ली में राजनीति एक बार फिर दो पार्टियों के बीच सिमटने लगी है। प्रदेश कांग्रेस में फूट और शीला दीक्षित के निधन के बाद कांग्रेस तीसरे स्थान पर दिखाई दे रही है। ऐसे में भाजपा को इसका नुकसान भुगतना पड़ सकता है।
आप और कांग्रेस का वोट बैंक एक ही माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से झुग्गी-झोपड़ी, अनधिकृत कॉलोनी व अल्पसंख्यकों के वोट शामिल हैं। शीला दीक्षित के दोबारा कांग्रेस की कमान संभालते ही यह वोट बैंक आप से खिसक गया था।
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इससे दिल्ली में राजनीतिक समीकरण भी बदला है। इसके मद्देनजर विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा परेशान है। उधर, आप अभी से गुणा-भाग में जुट गई है।
दिल्ली में राजनीति एक बार फिर दो पार्टियों के बीच सिमटने लगी है। प्रदेश कांग्रेस में फूट और शीला दीक्षित के निधन के बाद कांग्रेस तीसरे स्थान पर दिखाई दे रही है। ऐसे में भाजपा को इसका नुकसान भुगतना पड़ सकता है।
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आप और कांग्रेस का वोट बैंक एक ही माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से झुग्गी-झोपड़ी, अनधिकृत कॉलोनी व अल्पसंख्यकों के वोट शामिल हैं। शीला दीक्षित के दोबारा कांग्रेस की कमान संभालते ही यह वोट बैंक आप से खिसक गया था।
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इसकी बानगी लोकसभा चुनाव में दिखी। शीला दीक्षित की शख्सियत के ही कारण मृतप्राय नजर आ रही कांग्रेस 7 में से 5 सीटों पर दूसरे नंबर पर आई। 16वीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर थी। पिछले विधानसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। सभी दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा था।
रणनीतिकारों की मानें तो छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उम्मीद थी कि कांग्रेस पुराने वोट बैंक के साथ बेहतर स्थिति में होगी और आप को नुकसान उठाना पड़ेगा। अब स्थिति बदलती दिखाई पड़ रही है।
उधर, भाजपा की चिंता यह है कि कांग्रेस के कमजोर होने से आप की मजबूती बढ़ेगी। उसे अल्पसंख्यक, झुग्गी झोपड़ी व अनधिकृत कॉलोनियों के वोट आप के पास जाने की आशंका है। ऐसी स्थिति में उसकी चुनावी जीत आसान नही होगी।
रणनीतिकारों की मानें तो छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उम्मीद थी कि कांग्रेस पुराने वोट बैंक के साथ बेहतर स्थिति में होगी और आप को नुकसान उठाना पड़ेगा। अब स्थिति बदलती दिखाई पड़ रही है।
उधर, भाजपा की चिंता यह है कि कांग्रेस के कमजोर होने से आप की मजबूती बढ़ेगी। उसे अल्पसंख्यक, झुग्गी झोपड़ी व अनधिकृत कॉलोनियों के वोट आप के पास जाने की आशंका है। ऐसी स्थिति में उसकी चुनावी जीत आसान नही होगी।
आप के रणनीतिकार भी सियासी गुणा-भाग में खुद को बेहतर देख रहे हैं। उनका जोर अनधिकृत कॉलोनियों मे विकास और मूलभूत सुविधाएं देने के साथ मालिकाना हक पर है। उधर, भाजपा भी इस वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश में है। फिलहाल सभी की नजर कांग्रेस के नए प्रदेश नेतृत्व पर टिकी है।