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Pitru Paksha: श्राद्ध आज से, जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया, वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों की कहानी

Sat, 10 Sep 2022 07:48 AM IST
अनुराग सक्सेना दीपक सिंह नेगी, नई दिल्ली।
दीपक सिंह नेगी, नई दिल्ली। Published by: अनुराग सक्सेना Updated Sat, 10 Sep 2022 07:48 AM IST
सार

आज से पितृ पक्ष शुरू होने जा रहे हैं। इसमें परिवार अपने पितरों के तर्पण और उनकी आत्मा की शांति के लिए विधान करता है। विसंगति यह भी है कि बड़ी संख्या में बुजुर्गों को अपनों ने ही बेसहारा कर दिया है। समाज के इसी विरोधाभास पर कभी कबीर दास ने तंज किया था कि जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया...।

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Pitru Paksha Shradh from today no one worships the living father worshiped after death
वृद्धाश्रम में बैठे बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली की सड़कों पर भटकतीं रूपमणी को किसी ने तीन साल पूर्व नांगलोई के एक वृद्धाश्रम में पहुंचाया था। झुकी कमर, कांपते हाथ और चेहरों की झुर्रियों में लाचारी छुपाने की नाकाम कोशिश करतीं रूपमती की आंखें अपने जवानी के दिनों को याद कर नम हो जाती हैं। जिस बेटे को कभी पीठ तो कभी कांधे पर उठाकर बचपन में घुमाया, वह बुढ़ापे में उनका बोझ नहीं उठा पाया।

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ये सिर्फ रूपमती की नहीं बल्कि कई बुजुर्गों की कहानी है, जो अपनों के तिरस्कार के कारण वृद्धाश्रमों में रह रहे हैं। आज से पितृ पक्ष शुरू होने जा रहे हैं। इसमें परिवार अपने पितरों के तर्पण और उनकी आत्मा की शांति के लिए विधान करता है। विसंगति यह भी है कि बड़ी संख्या में बुजुर्गों को अपनों ने ही बेसहारा कर दिया है। समाज के इसी विरोधाभास पर कभी कबीर दास ने तंज किया था कि जिंदा बाप कोई न पूजे, मरे बाद पुजवाया...।

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जिसे सहारा दे चलना सिखाया वह बेसहारा छोड़ गया 

करीब एक साल पहले केरल के करुणाकरन बेटे के साथ दिल्ली आए थे। बताते हैं कि वह पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे थे। उनके बेटे को नोएडा में किसी से साढ़े सात लाख रुपये लेने थे। वह पैसे लेने की बात कहकर चला गया, लेकिन आज तक नहीं लौटा। आंसूओं को पोछते हुए करुणाकरन कहते हैं कि जिस बेटे को मैंने उंगली का सहारा देकर चलना सिखाया था वह मुझे अनजान शहर में बेसहारा छोड़ गया। भगवान ऐसी औलाद किसी को न दे।

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भरा परिवार है पर मेरे लिए जगह नहीं

रमावती के परिवार में बेटे-बेटियों का भरा पूरा परिवार है। उनके नाती पोते भी हैं। सब हंसी खुशी रहते हैं लेकिन उनको रखने के लिए किसी के यहां जगह नहीं है। अपनों को याद कर 75 साल की रमावती दिन में अक्सर ही रोने लगती हैं। रुंधे गले से कहती हैं कि सब ऊपर वाले का लिखा है। शायद मेरे प्यार और परवरिश में ही कोई कमी रह गई होगी जो इन उम्र में मुझे अपनों का साथ नहीं मिल सका।

अपनों ने किया परायों सा बर्ताव

बहुत बड़ा परिवार है, सब बहुत अच्छे हैं। भांजा तो यहां आता रहता है। यह कहना है नांगलोई के जय मां दुर्गा वृद्धाश्रम में रहने वाले अनिल का। अनिल के परिवार में बेटा-बहू हैं। परिवार के बारे में बताते हुए उनकी आंखें छलक पड़ीं। वह कुछ ज्यादा बोलने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन यहां रह रहे बुजुर्ग बताते हैं कि उनके साथ सही बर्ताव नहीं होता था। इस कारण उन्होंने वृद्धाश्रम में आश्रय लिया है।

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