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हवा में जहर..सांस लें तो लगता है डर
अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Sat, 05 Dec 2015 05:40 PM IST
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हवा में घुल रहा धूल-धुआं और जहरीली गैसों का असर सेहत को खोखला कर रहा है। प्रदेश में लगातार चार साल से सबसे ज्यादा प्रदूषित रहने वाले शहर गाजियाबाद में कई स्थान ऐसे हैं, जहां सांस लेना खतरनाक है।
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एसपीएम की मात्रा यहां मानक से छह गुना तक है। यह हाल तब है, जबकि देश में पर्यावरण मानक विदेशों से तीन गुने बनाए गए हैं।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग केवल दो स्थानों पर हवा की जांच कराकर शहर के पर्यावरण का अंदाजा लगा रहा है। लोगों को मास्क पहनकर और मुंह पर कपड़ा बांधकर खुद को प्रदूषण से बचाना होगा।
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महानगर में एसपीएम की सबसे खतरनाक स्थिति पीएम-2 की है। पीएम (पार्टीकल मालीकूल्स) 10 जहां नाक के बालों में उलझकर कम नुकसान पहुंचाता है, वहीं पीएम-2 नाक के बालों से नहीं रुकता।
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इसका आकार बालों की मोटाई का 10 वां हिस्सा होता है। ऐसे में यह सीधे फेफड़ों में चला जाता है। सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि फेफड़ों में एक बार पहुंचने के बाद यह कभी बाहर नहीं निकलता।
इससे फेफड़ों की क्षमता प्रभावित होती रहती है। अमेरिका में स्वच्छ हवा के लिए पीएम-2 का मानक 20 है, जबकि अपने यहां यह 60 निर्धारित है। मौकेपर पीएम-2 की मात्रा 300 से ज्यादा है।
कॉकटेल करेगा परेशान
पर्यावरण विशेषज्ञ डा. विवेकराज सिंह के अनुसार डीजल वाहन, वनस्पतियों को जलाने और कम तापमान का कॉकटेल फिलहाल प्रदूषण से ज्यादा परेशान करेगा। एनसीआर सहित ज्यादा पॉल्यूशन वाले क्षेत्रों में यह स्थित मार्च में गर्मी बढ़ने तक रहेगी।
डा. अविनाश शर्मा के अनुसार प्रदूषण से सांस फूलने, बीपी हाई रहने, त्वचा व आंखों का संक्रमण होने और खून की नलियों में ब्लाकेज होने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है।
इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है। राजनगर एक्सटेंशन के प्रमोद धनकड़ ने बताया कि प्रदूषण से लोगों को सांस व फेफड़ों संबंधी बीमारी होने लगी हैं।
सबसे ज्यादा नुकसान
शहर की हवा में जहरीली गैसों के साथ ही रसायनों में लिपटे धूल-धुआं के कण भी उड़ रहे हैं। इनको एसपीएम कहते हैं। एसपीएम की मात्रा 50 से 60 पार्टीकल प्रति क्यूब मीटर होनी चाहिए।
जबकि शहर में इनकी मात्रा 240 से 300 पार्टीकल प्रति क्यूब मीटर है। इसी तरह सीओ(कार्बन मोनो आक्साइड), सीओ 2 (कार्बन डाई आक्साइड), एसओ 2 (सल्फर डाई आक्साइड) और एनओ 2 (नाइट्रोजन डाई आक्साइड) की मात्रा मानकों से ज्यादा है।
इनके कारण व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। यही हाल रहा तो एक दशक में एनसीआर में सांस लेना संभव नहीं होगा।
शहर के प्रदूषित आवासीय क्षेत्र
राजनगर एक्सटेंशन, चौधरी मोड़, पुराना बस अड्डा, हापुड़ तिराहा, जीटी रोड, लोहियानगर
प्रदूषण मापने के नहीं हैं यंत्र
आरडब्ल्यूए फेडरेशन के अध्यक्ष कर्नल टीपी त्यागी ने बताया कि शहर में वाहनों से मूविंग पॉल्यूशन फैल रहा है, जबकि जेनरेटरों और निर्माणाधीन भवनों से स्टेटिक पॉल्यूशन फैल रहा है।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के पास एयर सैंपलर नहीं है। शहर में मोहननगर और माडल टाउन में प्रदूषण की जांच कराकर ही शहर का आकलन किया जा रहा है। प्रदूषण रोकने की कोई योजना अफसरों के पास नहीं है।