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फूहड़ वीडियो बदनाम कर रहे मेवात की संस्कृति
Updated Wed, 26 Aug 2015 05:21 PM IST
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दिल्ली जायो तबाक लेतो आयो जिठानी ढमला पे लडी रे, मेरा चौंतरा पे चढ आयो पानी चले ना जंगल कू जिठानी, मुंढेरी तेरी अजब बनी महलावती रे जैसे पुराने मेवाती कल्चर के गाने अब कहीं नजर नहीं आते बल्कि मेवात कि संस्कृति को फूहड सिंगलवाटी गानें बदनाम कर रहे हैं।
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आजकल मेवाती गानों में प्यार आपसी भाईचारा और मेवाती संस्कृति झलकने कि बजाये इनकी जगह फूहड और खुले गंदे गानों ने ले ली है, इन गानों को परिवार के साथ सुनना तो दूर बाप बेटे भी एक साथ नहीं सुन सकते।
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केसिट और सीडी पर गानों के छपे लुटा-लुटा कर मारेगें, असमीना कि पप्पी और रजिया कि छाती, जंफर उठा दूंगा रिमोर्ट से जैसे टाईटलों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके अंदर कितना फूहड भरा हुआ है।
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मेवात क्षेत्र के समाजसेवी और प्रमुख महिला और पुरूषों ने ऐसे अभद्र गानों पर तुरंत रोक लगाने तथा इन फूहड गानें वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें तुरंत गिरतार करने कि मांग की है। मेवात जिला में अधिक्तर सडक दुर्घनायें इन्हीं गानों की वजह से होती हैं।
समाजसेवी असमत खां, डाक्टर बशीर अहमद और समाजसेवी रमजान चौधरी का कहना है कि मेवात में चल रहे आजकल के फूहड गानों ने मेवात कि संस्कृति को बिगाड कर रख दिया है।
गानों में हो रहा अभद्र भाषा का प्रयोग
मेवात में जो गाने चल रहे हैं उनका कोई मतलब तो निकलता ही नहीं है, बल्कि उनमें सीधे-सीधे गाली गलौंच की भाषा का प्रयोग किया गया है।
पहले तो ओडियो केसिट हुआ करती थी लेकिन अब इसकी जगह वीडियों सीडी ने ले ली है। मेवात का ऐसा कोई वाहन या डंफर होगा जिसमें ड्राईवर के सामने सीडी स्क्रीन न लगी हो, इसह वजह से अकसर सडक दुर्घनाएं होती हैं।
जिला पार्षद जैतूनी बेगम और समाजसेविका सबीला का कहना है कि आज से जो 30-40 साल पहले जो मेवाती गानों कि बात हुआ करती थी वे आज नहीं है।
उन्होने कहा कि इसका सबसे बडा कारण मेवाती भाषा में गाने लिखने वाला कोई पढ लिखा शायर नहीं है बल्कि जो कल गाने लिख रहे है वे अनपढ के समान है, इन गानों का कोई मकसद और मतलब भी नहीं होता है।
इन गानो में एक दूसरे को गाली देने जैसा रिवाज है। अब से करीब 30 साल पहले मेवाती समाज से जुडे गाना हुआ करते थे, जिनका मतलब होता था। उन गानों से मेवाती भाषा की संस्कृति झलकती थी। अब नये फूहड गानों ने पुराने गानों को हाईजेक कर लिया है।
फिर से एक फजरूदीन की जरूरत
70 वर्षीय रमजान खां और 75 वर्षीय इसमाईल खान ने बताया कि उनके जमाने में मेरे चौंतरा पे चढ आयो पानी चले न जंगल कू जिठानी, दिल्ली जायो तबाक लेतो आयो जिठानी ढमला पे लडी जैसे गंभीर गाने हुआ करते थे। लेकिन आज के फूहड गानों ने इनको मिटा दिया है।
उनका कहना है कि उनके जमाने में मेवाती महिलायें नाच गानों से दूर रहती थी लेकिन जब से विडियों सीडी आई हैं महिलायें भी फूहड गाना गाने और नाचने में सबसे आगे हैं।
गौरतलब है कि करीब करीब साल पहले समाजसेवी गांव दौहा के सरपंच र्स्गीय फजरूदीन ने एक सामाजिक बेनर तले फूहड गानों के खिलफ एक मुहिम चलाई थी, उस समय पुन्हाना, बडकली चौक, फिरोजपुर झिरका, नूंह और पिनगवां में हजारों ओडियों कैसिट खुले आम चौराहयों पर जलाकर आग के हवाले किया था और कई गंदे गानों कि कैसिट बनाने वालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया था। लेकिन आज फिर से मेवात के लोगों को एक और फजरूदीन कि जरूरत है जो इस काम को अंजाम दे सके।
सबसे से दिलचश्प बात तो यह है कि इन गानों की ऑडियो, विडियों की सीडी बनाने वालों के पास सरकार से कोई मंजूरी भी नहीं है, ये लोग अवेध रूप से करोडो रूपये महिना कमाते है पर टैक्स के नाम पर सरकार को एक पैसा भी अदा नहीं करते।