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नाम सरकारी स्कूल के रजिस्टर में, पढ़ाई मदरसे में: नूंह के 70 स्कूलों की पड़ताल, खामियों की लंबी फेहरिस्त

Tue, 03 Nov 2026 09:51 AM IST
Vijay Singh Pundir सीमा शर्मा, अमर उजाला, नूंह
सीमा शर्मा, अमर उजाला, नूंह Published by: Vijay Singh Pundir Updated Tue, 03 Nov 2026 09:51 AM IST
सार

नूंह जिले में सरकारी स्कूलों की बदहाली की तस्वीर सामने आई है। जिले के 70 सरकारी स्कूलों की जमीनी पड़ताल में ज्यादातर में खामियों की लंबी फेहरिस्त मिली है।

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Amar Ujala conducted an on-the-ground investigation in 70 government schools in Nuh
नूंह के 70 स्कूलों की पड़ताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली से महज 70 किमी दूर देश के 112 पिछड़े जिलों में शुमार नूंह जिले के फिरोजपुर गांव में 13 साल की इल्मा का नाम सरकारी स्कूल की नौवीं कक्षा में दर्ज है। लेकिन वह कभी स्कूल के गेट में दाखिल नहीं हुई। सारमी (14), आतिका (11), मोहम्मद  (13) और सुहैल सरकारी रिकॉर्ड में नौवीं, आठवीं और सातवीं में हैं, पर उन्होंने स्कूली किताब, कक्षा या शिक्षक को कभी देखा तक नहीं। उनकी पढ़ाई-लिखाई मदरसे में या घर से चल रही है। ताज्जुब है कि 70 फीसदी बेटियों के नाम हर साल अगली कक्षा में बढ़ रहे हैं, जबकि वे कक्षा, किताब-कॉपी व शिक्षक से कोसों दूर हैं। कागजों में डेढ़ लाख छात्र हाजिर हैं लेकिन ये स्कूलों के बजाय मदरसों में तालीम ले रहे हैं। अमर उजाला ने जिले के 70 सरकारी स्कूलों में जमीनी पड़ताल की, पेश है विस्तृत रिपोर्ट......।

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धूल फांकती किताबें और कुर्सियां टूटे फर्श, सीलन भरी दीवारें, जर्जर छत,  टाट की जगह कागज-गत्तों पर बैठी बच्चियां, पेयजल के लिए बूंद-बूंद को तरसते बच्चे और गंदे शौचालय... यही है इस इलाके के स्कूलों की असल तस्वीर।

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केस-1 : कक्षा में खुले बैग और बाहर घूमते बच्चे, पढ़ने-पढ़ाने से कोई वास्ता नहीं 
केंद्र और राज्य इस स्कूल में मूलभूत सुविधाओं के लिए करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। हाईवे से मेन गेट की ओर देखने पर सब कुछ ठीक दिखता है लेकिन चंद कदम आगे बढ़ते ही स्कूल की बदहाली नजर आने लगती है। यूनिफॉर्म में बाहर घूमते बच्चे,  प्रिंसिपल रूम में खाली कुर्सी, पीसीए-आईटी लैब में लटका ताला, अगले कमरों में क्लासरूम में बेंच पर खुले बैग और छात्र नदारद, धूल फांकती लाइब्रेरी और कंप्यूटर। लड़कियों के शौचालय और पेयजल का नल तो मिला लेकिन उसमें एक बूंद भी पानी नहीं मिला। थोड़ा आगे मिड-डे मील में बच्चों के लिए सादे चावल तो अंदर महिला कर्मी पीले चावल खाती मिलीं। अंदर दो और गेट से आउटसाइडर बेरोकटोक टहलते मिले। कई बच्चे और शिक्षक गायब मिले, जो मिले भी उन्हें पढ़ने-पढ़ाने से कोई वास्ता नहीं। परिसर में बाहरी युवा और लावारिस जानवर दिखे।

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केस-2 : सात महीने के बाद भी होमवर्क  की कॉपी में महज 3-4 पन्ने लिखे मिले
प्रवेश करते ही सामने बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर, वर्दी में अनुशासित छात्र और शिक्षक मुस्तैदी से पढ़ाते मिले। यहां भी प्रिंसिपल अनुपस्थित तो आईजीटी, कंप्यूटर, मिनी साइंस लैब और लाइब्रेरी में लटका ताला। नौंवी की गर्ल्स सेक्शन में एसएसटी टीचर का इंतजार तो लड़कों के खंड में बच्चे अधिक होने के कारण कुछ नीचे बैठकर पढ़ते दिखे। छठीं से आठवीं कक्षा में शिक्षक पढ़ाते जरूर मिले लेकिन बच्चे बैग बंद करके बैठे मिले। सात महीने का सत्र बीतने के बाद कॉपी में महज तीन से चार पन्नों पर होमवर्क मिला। बच्चों के बैग में किताबें तक नहीं और होमवर्क की सबकी कॉपी खाली दिखी।

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छात्रों के उपस्थिति पोर्टल पर फर्जी हाजिरी...इन स्कूलों में अटेंडेंस पोर्टल पर छात्रों की 70 से 80 फीसदी तक हाजिरी दिखी। कक्षाओं में आधी संख्या भी नहीं मिली। अधिकतर छात्र मदरसों से तालीम हासिल करने के बाद दस बजे के बाद स्कूल पहुंचे। वे आए और मिड-डे मील खाकर आधी छुट्टी के बाद चले गए। जब शिक्षकों से सवाल किया तो उनका तर्क मिला यहां बच्चों को जाने से नहीं रोक सकते क्योंकि अभिभावक हमें साफ कहते हैं कि वे मदरसे में जाएंगे। बेटियों का कहना है कि अभिभावक उन्हें स्कूल नहीं जाने देते।

मिडिल कक्षा का सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर भी नहीं जानतीं
गांव की अधिकतर बेटियों का नाम यहां के सरकारी स्कूल में दर्ज है। बच्चियों और परिजनों ने  ऑन कैमरा स्वीकार किया कि वे स्कूल के बजाय मदरसे से तालीम ले रही हैं।  इनके पास मिडिल कक्षा का सर्टिफिकेट तो है पर हस्ताक्षर क्या होता है पता नहीं।

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