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ओलंपियन सतीश: सेना का प्रशिक्षण और पिता के वीडियो ने नहीं मानने दी घायल मुक्केबाज को हार, युवाओं को दिया जीत का मंत्र

Sat, 07 Aug 2021 02:58 PM IST
पूजा त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा
अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Sat, 07 Aug 2021 02:58 PM IST
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olympian satish returns home gave winning matra to youngsters know how his moral was boosted
सतीश कुमार का हुआ नोएडा में स्वागत - फोटो : अमर उजाला

ओलंपियन सतीश कुमार यादव शुक्रवार को नोएडा के गढ़ी चौखंड़ी स्थित भारतीय किसान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र यादव के आवास पहुंचे। सेना के जवान और हैवीवेट मुक्केबाज सतीश कुमार (32) ने टोक्यो ओलंपिक में इस साल क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया। सतीश उज्बेकिस्तान के बखोदिर जलोलोव से हारकर पदक की रेस से बाहर हो गए, लेकिन उनकी हिम्मत और जज्बे का लोहा प्रतिद्वंद्वी भी मान गए। जब उन्होंने जख्मी होने और ठुड्डी और भौं (आइब्रो) पर 13 टांके लगने के बावजूद खेल में हिस्सा लिया। पेश है अमर उजाला रिपोर्टर प्रगति मिश्रा के साथ उनका खास इंटरव्यू...

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आपका मुक्केबाजी का सफर कब और कैसे शुरू हुआ?
मैं बुलंदशहर के पचौता गांव का रहने वाला हूं। ग्रामीण परिवेश की वजह से बचपन में ओलंपिक या मुक्केबाजी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। मेरे भाई और गांव के अन्य लड़के सेना में थे। मैं भी सेना में देशभक्ति दिखाने के मकसद से शामिल हुआ। जहां मुझे खेलों की जानकारी और ट्रेनिंग मिली। सेना ने मुझे एक सैैनिक संग ओलंपियन भी बनाया। 
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छोटे से गांव से निकलकर ओलंपियन बनने तक का आपका सफर रहा है। अपनी इस सफलता का श्रेय किसे देते हैं?
माता-पिता ने मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। साथ ही आर्मी और मेरे कोच मेरी सफलता का बड़ा कारण रहे हैं। 

ओलंपिक में चोट लगने के बाद का अनुभव कैसा रहा?
प्री-क्वार्टर मैच में प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी का सिर चेहरे पर लगा था। इससे चिन और आइब्रो में 13 टांके आए। क्वार्टर फाइनल से पहले मेडिकल चेकअप हुआ। जांच के बाद डॉक्टरों ने नॉट गुड बोला। मैंने उनसे खेलने देने की विनती की। मैं ओलंपिक में अपना 100 फीसदी देना चाहता था। बिना खेले हार नहीं मान सकता था। चोट के साथ खेलना आसान नहीं था, लेकिन मुझे मिली सेना की ट्रेनिंग पीछे न हटने का जोश दे रही थी। साथ ही मेरे पिता और भाई ने वीडियो संदेश के जरिये हौसला बढ़ाया। आर्मी और मेरे पिता ने मुझे हर परिस्थिति से लड़ने की प्रेरणा दी।

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भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?

हार के बाद भी लोगों ने बेहद प्यार और सम्मान दिया है। ओलंपिक में देश के लिए पदक नहीं ला पाने का मलाल मुझे अभी भी सता रहा है। वर्ष 2024 में पेरिस ओलंपिक में दोबारा खेलकर देश के लिए पदक लाना चाहता हूं। इसके लिए लगातार कड़ी मेहनत करूंगा।

खेलों में देश की स्थिति एवं खिलाड़ियों की सुविधाओं पर आपकी क्या राय है?
देश में खिलाड़ियों के लिए ट्रेनिंग और अन्य सुविधाएं बढ़नी चाहिए। जिससे हमारा अलग-अलग खेलों में प्रतिनिधित्व और जीत का सिलसिला बढ़ सके। फिलहाल कई खिलाड़ी कम सुविधाओं के बावजूद बहुत अच्छा कर रहे हैं, यदि उन्हें प्रोत्साहन मिले तो और बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं।

आप युवा खिलाड़ियों को क्या संदेश देना चाहते हैं ?
मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। यदि सफल होना चाहते हैं तो मेहनत एवं लगन की राह अपनाएं। अपना 100 प्रतिशत देकर और सही प्रशिक्षण पाकर आप आगे बढ़ सकते हैं।

पूरे देश को सतीश कुमार पर गर्व
ओलंपियन सतीश कुमार के शुक्रवार दोपहर करीब 12:30 बजे गढ़ी चौखंड़ी पहुंचने पर फूल मालाओं से भव्य स्वागत किया गया। सतीश की एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ नजर आई। राजेंद्र यादव ने कहा कि किसान परिवारों के बच्चे ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। चोटिल होने के बावजूद डॉक्टर और कोच के मना करने के बाद भी सतीश ने जिस साहस के साथ सेमीफाइनल खेला है, वह काबिल-ए-तारीफ है। आज पूरे देश को सतीश गर्व है। इस मौके पर किसान संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव यादव, रवि प्रमुख, रणी प्रधान, चमन चौहान, जयप्रकाश, ओम प्रकाश, राजकुमार शर्मा, रिंकू, दिव्यांशु, अमित, विकास और विष्णु तिवारी आदि लोग मौजूद रहे।

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