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नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को हो रहा 7500 करोड़ का नुकसान
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नोएडा/नई दिल्ली। बिल्डरों को मार्जिनल कॉस्ट लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) पर ब्याज चुकाने का मौका मिल जाता है तो इससे नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को 7500 करोड़ का नुकसान होगा। प्राधिकरणों के पास आय का दूसरा कोई साधन नहीं है। लिहाजा अपील मानी जाए। नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के वकील ने सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में यही तर्क रखा। बिल्डरों के साथ प्राधिकरण के ब्याज के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अगली सुनवाई 1अक्तूबर को तय की गई है।
दरअसल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले के आदेश में एमसीएलआर पर ब्याज लेने को कहा था, लेकिन प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में संशोधन याचिका डाल दी। इस पर सुनवाई हो रही है। फिलहाल प्राधिकरण का पक्ष सुना जा रहा है। इसके बाद बिल्डर पक्ष अपना तर्क रखेगा। बिल्डरों का कहना है कि प्राधिकरणों ने मनमानी ब्याज दर पर उनसे राशि ली है। साधारण ब्याज पर पैसे लिए जाएंगे तो उनका काफी पैसा बचेगा। बिल्डर पक्ष की बात सुनने के बाद कोर्ट की ओर से इस मामले में फैसला सुनाया जाएगा। इस फैसले के आधार पर नोएडा-ग्रेटर नोएडा के करीब 1.5 लाख फ्लैट खरीदारों की रजिस्ट्री का रास्ता खुलेगा।
प्राधिकरण का कहना है कि पिछले साल अदालत ने आदेश दिया था कि बिल्डर या कंपनियों को लीड पर दी जाने वाली जमीन की बकाया राशि पर आठ फीसदी ही ब्याज लिया जा सकता है। प्राधिकरण के अनुसार बिल्डरों ने अदालत को कई बातों की सही जानकारी नहीं दी थी जिसकी वजह से पिछले साल दस जून को यह आदेश दिया गया। जस्टिस यूयू ललित और अजय रस्तोगी की पीठ को प्राधिकरण के वकील रवींद्र कुमार ने बताया 10 जून 2020 के आदेश में प्राधितरण 2010 के बाद से जो ब्याज दर बिल्डरों से वसूल रहा था उसे सीमित कर दिया गया। जबकि ब्याज दर पर प्राधिकरण और बिल्डरों के बीच अनुबंध था। उन्होंने कहा कि एस ग्रुप की याचिका पर यह आदेश दिया गया, यह कहा गया कि प्राधिकरण ने अपनी बात अदालत के सामने रखी। सचाई यह है कि प्राधिकरण को कोई नोटिस ही जारी नहीं किया गया था। बिल्डर ने निचले अधिकारियों से साठगांठ कर यह खेल कर दिया। वकील ने कहा कि अदालत एक बार उनकी बात सुने तो अच्छा होगा। उस समय अदालत के एस ग्रुप ही था। अब इसमें सुपरटेक और पंचशील बिल्डर भी जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि एस ग्रुप ने खुद ग्राहकों से वसूले जा रहे 18 फीसदी चक्रवृद्धि ब्याज की बाबत अदालत को कोई जानकारी नहीं दी। यह सब 2017 में आम्रपाली का केस सामने आने से पहले की बात है। बिल्डर 18 फीसदी वसूल रहे थे और प्राधिकरण केवल 11 फीसदी और वह भी आसान किस्तों में। लेकिन फिर भी प्राधिकरण को दंडित किया गया।
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आम्रपाली मामले में फोरेंसिक आडिटर ने रिपोर्ट जमा की
आम्रपाली मामले में पवन कुमार अग्रवाल (फोरेंसिक आडिटर) ने कोर्ट के निर्देश के अनुसार सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट पेश की। अदालत ने अग्रवाल से कहा कि वे इस रिपोर्ट को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ भी साझा करें। ईडी आम्रपाली ग्रुप के पूर्व निदेशक प्रेम मिश्रा की 4.79 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच कर चुका है। मिश्रा पर फर्जी कंपनियां बनाकर ग्राहकों का पैसा लगाने का आरोप है। ईडी का कहना है कि मिश्रा ने दस करोड़ रुपये से ज्यादा की गड़बड़ की है। इसे मिश्रा ने गलत बताया। अदालत ने मिश्रा और ईडी से विसंगति दूर करने को कहा। इस मामले में अगली सुनवाई 5 अक्तूबर को होगी। 3 सितंबर को अदालत ने आम्रपाली ग्रुप के खरीदारों से कहा था कि वे किस्तों का भुगतान जरूर करें। ऐसा नहीं करने पर उनका फ्लैट रद्द हो जाएंगे।
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दरअसल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले के आदेश में एमसीएलआर पर ब्याज लेने को कहा था, लेकिन प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में संशोधन याचिका डाल दी। इस पर सुनवाई हो रही है। फिलहाल प्राधिकरण का पक्ष सुना जा रहा है। इसके बाद बिल्डर पक्ष अपना तर्क रखेगा। बिल्डरों का कहना है कि प्राधिकरणों ने मनमानी ब्याज दर पर उनसे राशि ली है। साधारण ब्याज पर पैसे लिए जाएंगे तो उनका काफी पैसा बचेगा। बिल्डर पक्ष की बात सुनने के बाद कोर्ट की ओर से इस मामले में फैसला सुनाया जाएगा। इस फैसले के आधार पर नोएडा-ग्रेटर नोएडा के करीब 1.5 लाख फ्लैट खरीदारों की रजिस्ट्री का रास्ता खुलेगा।
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प्राधिकरण का कहना है कि पिछले साल अदालत ने आदेश दिया था कि बिल्डर या कंपनियों को लीड पर दी जाने वाली जमीन की बकाया राशि पर आठ फीसदी ही ब्याज लिया जा सकता है। प्राधिकरण के अनुसार बिल्डरों ने अदालत को कई बातों की सही जानकारी नहीं दी थी जिसकी वजह से पिछले साल दस जून को यह आदेश दिया गया। जस्टिस यूयू ललित और अजय रस्तोगी की पीठ को प्राधिकरण के वकील रवींद्र कुमार ने बताया 10 जून 2020 के आदेश में प्राधितरण 2010 के बाद से जो ब्याज दर बिल्डरों से वसूल रहा था उसे सीमित कर दिया गया। जबकि ब्याज दर पर प्राधिकरण और बिल्डरों के बीच अनुबंध था। उन्होंने कहा कि एस ग्रुप की याचिका पर यह आदेश दिया गया, यह कहा गया कि प्राधिकरण ने अपनी बात अदालत के सामने रखी। सचाई यह है कि प्राधिकरण को कोई नोटिस ही जारी नहीं किया गया था। बिल्डर ने निचले अधिकारियों से साठगांठ कर यह खेल कर दिया। वकील ने कहा कि अदालत एक बार उनकी बात सुने तो अच्छा होगा। उस समय अदालत के एस ग्रुप ही था। अब इसमें सुपरटेक और पंचशील बिल्डर भी जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि एस ग्रुप ने खुद ग्राहकों से वसूले जा रहे 18 फीसदी चक्रवृद्धि ब्याज की बाबत अदालत को कोई जानकारी नहीं दी। यह सब 2017 में आम्रपाली का केस सामने आने से पहले की बात है। बिल्डर 18 फीसदी वसूल रहे थे और प्राधिकरण केवल 11 फीसदी और वह भी आसान किस्तों में। लेकिन फिर भी प्राधिकरण को दंडित किया गया।
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आम्रपाली मामले में फोरेंसिक आडिटर ने रिपोर्ट जमा की
आम्रपाली मामले में पवन कुमार अग्रवाल (फोरेंसिक आडिटर) ने कोर्ट के निर्देश के अनुसार सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट पेश की। अदालत ने अग्रवाल से कहा कि वे इस रिपोर्ट को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ भी साझा करें। ईडी आम्रपाली ग्रुप के पूर्व निदेशक प्रेम मिश्रा की 4.79 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच कर चुका है। मिश्रा पर फर्जी कंपनियां बनाकर ग्राहकों का पैसा लगाने का आरोप है। ईडी का कहना है कि मिश्रा ने दस करोड़ रुपये से ज्यादा की गड़बड़ की है। इसे मिश्रा ने गलत बताया। अदालत ने मिश्रा और ईडी से विसंगति दूर करने को कहा। इस मामले में अगली सुनवाई 5 अक्तूबर को होगी। 3 सितंबर को अदालत ने आम्रपाली ग्रुप के खरीदारों से कहा था कि वे किस्तों का भुगतान जरूर करें। ऐसा नहीं करने पर उनका फ्लैट रद्द हो जाएंगे।