{"_id":"5f4a8c7d8ebc3e0bf8382962","slug":"muharram-in-nuh-fair-stopped-in-50-villages-mewat-news-noi532799263","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिले में ताजिये निकलने बंद, पहले 50 से अधिक गांवों में लगते थे मेले","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिले में ताजिये निकलने बंद, पहले 50 से अधिक गांवों में लगते थे मेले
विज्ञापन
पुन्हाना। जैसे-जैसे समय बदलता गया जिले में मोहर्रम मनाने के तरीके भी बदलते गए। 50 साल पहले करीब 50 से अधिक गांवों में ताजिये निकाले जाते और मेले लगते थे। दो वर्ष पहले पुन्हाना खंड के गांव बिछौर में ताजिये निकलते थे, लेकिन अब वहां भी सब बंद हो गया। इसका मुख्य कारण इलाके के लोगों द्वारा मेलों में शराब पीकर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और सुन्नी फिरका में ताजियों को निकालना गुनाह बताया जाना है।
इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और इमाम हसन की शहादत के मौके पर उनकी याद में हर साल ताजिये निकाले जाते हैं। जिनको सुन्नी फिरका के लोग गलत बताते हैं। इस बार मोहर्रम 30 अगस्त को मनाया जा रहा है। मेवात में मोहर्रम के 10 दिनों में महिलाएं गांवों में रात भर इमाम हुसैन की शहादत के गम में अपनी छाती पीटकर हब्दा देती और मरसिया, गमगीन गाने गाकर मातम मनाया करती थी। नौजवान पटेबाजी का हुनर दिखाते थे यह सिलसिला पूरे जिले में पूरे 10 दिन चलता था।
जमियत उलेमा हिंद के हरियाणा एवं पंजाब प्रांत के सदर मोलाना याहया करीमी का कहना है कि ऐसे मेले निकालने नाजायज नहीं है। उन्होंने बताया कि मोहर्रम का महीना गम का माह तो है लेकिन इस दौरान निर्धन लोगों को खाना खिलाना, शरबत पिलाना और लोगों की मदद करनी चाहिए न कि इमाम हुसैन और इमाम हसन का ताजिया बनाकर निकाल कर मातम मनाया जाए।
विज्ञापन
बशीर अहमद, इलयास खां का कहना है कि आज से करीब चालीस-पचास साल पहले नूंह के करीब 50 गांवों में ताजिये निकाले जाते थे, लेकिन मेले में असामाजिक तत्वों और पुलिस का कोई खास इंतजाम नहीं होने की वजह से ताजिये निकालना एक याददाश्त बनकर रह गए हैं।
विज्ञापन
इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और इमाम हसन की शहादत के मौके पर उनकी याद में हर साल ताजिये निकाले जाते हैं। जिनको सुन्नी फिरका के लोग गलत बताते हैं। इस बार मोहर्रम 30 अगस्त को मनाया जा रहा है। मेवात में मोहर्रम के 10 दिनों में महिलाएं गांवों में रात भर इमाम हुसैन की शहादत के गम में अपनी छाती पीटकर हब्दा देती और मरसिया, गमगीन गाने गाकर मातम मनाया करती थी। नौजवान पटेबाजी का हुनर दिखाते थे यह सिलसिला पूरे जिले में पूरे 10 दिन चलता था।
विज्ञापन
जमियत उलेमा हिंद के हरियाणा एवं पंजाब प्रांत के सदर मोलाना याहया करीमी का कहना है कि ऐसे मेले निकालने नाजायज नहीं है। उन्होंने बताया कि मोहर्रम का महीना गम का माह तो है लेकिन इस दौरान निर्धन लोगों को खाना खिलाना, शरबत पिलाना और लोगों की मदद करनी चाहिए न कि इमाम हुसैन और इमाम हसन का ताजिया बनाकर निकाल कर मातम मनाया जाए।
विज्ञापन
बशीर अहमद, इलयास खां का कहना है कि आज से करीब चालीस-पचास साल पहले नूंह के करीब 50 गांवों में ताजिये निकाले जाते थे, लेकिन मेले में असामाजिक तत्वों और पुलिस का कोई खास इंतजाम नहीं होने की वजह से ताजिये निकालना एक याददाश्त बनकर रह गए हैं।