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गड़बड़झाला : उद्योगों के हिस्से की जमीन बिल्डरों को बेच डाली
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ग्रेटर नोएडा वेस्ट।
- फोटो : Grnoida
गड़बड़झाला : उद्योगों के हिस्से की जमीन बिल्डरों को बेच डाली
ग्रेटर नोएडा (अरविंद सिंह)। ग्रेनो प्राधिकरण में बसपा-सपा शासनकाल में तैनात रहे कई पूर्व अफसरों की मुश्किल बढ़ने वाली हैं। उद्योगों के हिस्से की जमीन बिल्डरों को बेचने का मामला सामने आया है। कुल कीमत की सिर्फ पांच फीसदी रकम लेकर अफसर आवंटन करते गए, बाद में बकाया पैसे भी फंस गए। इस पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने आपत्ति दर्ज कराई है। इसकी रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। प्राधिकरण को अब इस पर जवाब देते नहीं बन रहा। कैग की तरफ से इसे सदन में शीघ्र रखने की तैयारी है।
प्राधिकरण सूत्रों के अनुसार, कैग के पहले फेज का ऑडिट पूरा हो चुका है। सीएजी की तरफ से कई बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज कराई गई, जिसमें सबसे बड़ा मसला लैंड यूज का है। प्राधिकरण ने उद्योग लगाने के नाम किसानों से जमीन खरीदी और उसे बिल्डरों को रिहायश में तब्दील कर आवंटित कर दी। मास्टर प्लान 2011 के मुताबिक, ग्रेनो का कुल क्षेत्रफल 13570 हेक्टेयर था, जिसमें रिहायश करीब 22 प्रतिशत और उद्योग करीब 20 फीसदी हिस्सा तय था, लेकिन उस समय 12 फीसदी के आसपास उद्योग लगे। बाकी जमीन बिल्डरों के खाते में चली गई। इसके अलावा व्यावसायिक व शिक्षण संस्थानों को अधिक जमीन आवंटित की गई। उद्योग लगाने पर बिल्कुल ध्यान नहीं रहा। इससे एसईजेड व परिवहन व्यवस्था के लिए भी जमीन नहीं बची। रिहायश के लिए सबसे ज्यादा जमीन 2007 से 2012 के बीच आवंटित की गई। ग्रेनो वेस्ट की जमीन भी बिल्डरों को इसी अवधि में आवंटित की गई है, सिर्फ पांच फीसदी रकम लेकर जमीन आवंटित कर दी गई। बाद में बिल्डरों ने किस्त देनी बंद कर दी।
नतीजा, मौजूदा समय तक का ब्याज मिलाकर प्राधिकरण का बिल्डरों पर 8000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया हो चुका है। पैसा न मिलने से प्राधिकरण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। योगी सरकार बनने के बाद से बसपा-सपा शासनकाल में जमीन आवंटन का ऑडिट कैग कर रहा है। कैग ने इस मसले पर आपत्ति लगाई, जिस पर प्राधिकरण ने जवाब बनाकर दे दिया है। सूत्र बताते हैं कि इस प्रकरण में उस समय तैनात रहे प्राधिकरण के पूर्व अफसरों की परेशानी बढ़ने वाली है, क्योंकि प्राधिकरण के तर्क से कैग संतुष्ट नहीं है। पहले चरण का ऑडिट पूरा हो चुका है।
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श्रेणी लैंड यूज का तय प्रतिशत वास्तविक स्थिति
रिहायश 22.10 39
इंडस्ट्रियल 19.16 12
ग्रीन एरिया 22.10 22
इंस्टीट्यूशनल 14.52 14
ट्रांसपोर्टेशन 9.43 5
एसईजेड 7.37 2
कॉमर्शियल 5.30 6
(नोट- लैंड यूज की वास्तविक स्थिति में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।)
लैंड यूज बदलने पर चल रही जांच
2007 से 2012 के बीच उद्योग की जमीन का लैंड यूज बदलकर रिहायश करने के मामले में पहले से ही जांच चल रही है। इसमें 19 अफसरों पर चार्जशीट भी हो चुकी है। बाकी अफसरों पर शीघ्र कार्रवाई हो सकती है। प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को उठाया था।
इसी से जुड़ा है आम्रपाली मामला
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में आम्रपाली को भी इसी अवधि में जमीन आवंटित की गई। उससे भी कुल रकम का पांच फीसदी लेकर पूरी जमीन आवंटित कर दी। बाद में वह किस्तें नहीं दे सका। डिफॉल्टर होता चला गया। अब तक का ब्याज मिलाकर करीब 4000 करोड़ रुपये बकाया हो चुका है। उसके सभी छह प्रोजेक्ट में करीब 28 हजार खरीदार फंस गए।
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ग्रेटर नोएडा (अरविंद सिंह)। ग्रेनो प्राधिकरण में बसपा-सपा शासनकाल में तैनात रहे कई पूर्व अफसरों की मुश्किल बढ़ने वाली हैं। उद्योगों के हिस्से की जमीन बिल्डरों को बेचने का मामला सामने आया है। कुल कीमत की सिर्फ पांच फीसदी रकम लेकर अफसर आवंटन करते गए, बाद में बकाया पैसे भी फंस गए। इस पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने आपत्ति दर्ज कराई है। इसकी रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। प्राधिकरण को अब इस पर जवाब देते नहीं बन रहा। कैग की तरफ से इसे सदन में शीघ्र रखने की तैयारी है।
प्राधिकरण सूत्रों के अनुसार, कैग के पहले फेज का ऑडिट पूरा हो चुका है। सीएजी की तरफ से कई बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज कराई गई, जिसमें सबसे बड़ा मसला लैंड यूज का है। प्राधिकरण ने उद्योग लगाने के नाम किसानों से जमीन खरीदी और उसे बिल्डरों को रिहायश में तब्दील कर आवंटित कर दी। मास्टर प्लान 2011 के मुताबिक, ग्रेनो का कुल क्षेत्रफल 13570 हेक्टेयर था, जिसमें रिहायश करीब 22 प्रतिशत और उद्योग करीब 20 फीसदी हिस्सा तय था, लेकिन उस समय 12 फीसदी के आसपास उद्योग लगे। बाकी जमीन बिल्डरों के खाते में चली गई। इसके अलावा व्यावसायिक व शिक्षण संस्थानों को अधिक जमीन आवंटित की गई। उद्योग लगाने पर बिल्कुल ध्यान नहीं रहा। इससे एसईजेड व परिवहन व्यवस्था के लिए भी जमीन नहीं बची। रिहायश के लिए सबसे ज्यादा जमीन 2007 से 2012 के बीच आवंटित की गई। ग्रेनो वेस्ट की जमीन भी बिल्डरों को इसी अवधि में आवंटित की गई है, सिर्फ पांच फीसदी रकम लेकर जमीन आवंटित कर दी गई। बाद में बिल्डरों ने किस्त देनी बंद कर दी।
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नतीजा, मौजूदा समय तक का ब्याज मिलाकर प्राधिकरण का बिल्डरों पर 8000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया हो चुका है। पैसा न मिलने से प्राधिकरण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। योगी सरकार बनने के बाद से बसपा-सपा शासनकाल में जमीन आवंटन का ऑडिट कैग कर रहा है। कैग ने इस मसले पर आपत्ति लगाई, जिस पर प्राधिकरण ने जवाब बनाकर दे दिया है। सूत्र बताते हैं कि इस प्रकरण में उस समय तैनात रहे प्राधिकरण के पूर्व अफसरों की परेशानी बढ़ने वाली है, क्योंकि प्राधिकरण के तर्क से कैग संतुष्ट नहीं है। पहले चरण का ऑडिट पूरा हो चुका है।
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श्रेणी लैंड यूज का तय प्रतिशत वास्तविक स्थिति
रिहायश 22.10 39
इंडस्ट्रियल 19.16 12
ग्रीन एरिया 22.10 22
इंस्टीट्यूशनल 14.52 14
ट्रांसपोर्टेशन 9.43 5
एसईजेड 7.37 2
कॉमर्शियल 5.30 6
(नोट- लैंड यूज की वास्तविक स्थिति में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।)
लैंड यूज बदलने पर चल रही जांच
2007 से 2012 के बीच उद्योग की जमीन का लैंड यूज बदलकर रिहायश करने के मामले में पहले से ही जांच चल रही है। इसमें 19 अफसरों पर चार्जशीट भी हो चुकी है। बाकी अफसरों पर शीघ्र कार्रवाई हो सकती है। प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को उठाया था।
इसी से जुड़ा है आम्रपाली मामला
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में आम्रपाली को भी इसी अवधि में जमीन आवंटित की गई। उससे भी कुल रकम का पांच फीसदी लेकर पूरी जमीन आवंटित कर दी। बाद में वह किस्तें नहीं दे सका। डिफॉल्टर होता चला गया। अब तक का ब्याज मिलाकर करीब 4000 करोड़ रुपये बकाया हो चुका है। उसके सभी छह प्रोजेक्ट में करीब 28 हजार खरीदार फंस गए।