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कैग का खुलासा : सहायक कंपनियां बनाकर बेची जमीन, मुनाफा कमाकर स्टांप राजस्व भी चुराया

Sun, 19 Dec 2021 01:24 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 19 Dec 2021 01:24 AM IST
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CAG Disclosure: Sold land by forming subsidiaries, stole stamp revenue by making profits
नोएडा (संजय शिशौदिया)। स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर नोएडा में बिल्डर, नेता और अधिकारियों के गड़बड़झाले का खुलासा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से हुआ है। बिल्डरों ने न तो प्राधिकरण का बकाया चुकाया और न ही स्पोर्ट्स सिटी के लिए काम किया। रिपोर्ट बताती है कि चार आवंटन में से तीन में 25 लाख वर्गमीटर से अधिक के क्षेत्रफल वाले 4,500 करोड़ रुपये के भूखंड अपात्र बिल्डरों को आवंटित किए गए थे, जो निर्धारित निवल मूल्य, कारोबार या पिछले अनुभव के तकनीकी पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करते थे। ऐसे बिल्डरों ने अपनी 30 फीसदी जमीन पर आवासीय योजना लाकर खरीदारों से पैसे जुटाए और निकल गए, जबकि आवंटी फंसते गए। किसी को समय से घर नहीं मिला तो किसी की रजिस्ट्री ही नहीं हुई। स्पोर्ट्स सिटी विकसित करने के नाम पर इन आवंटियों से बिल्डरों ने ऊंचे दाम भी वसूल लिए थे।
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नोएडा प्राधिकरण ने 2011-16 के दौरान चार स्पोर्ट्स सिटी के एकीकृत विकास के लिए 33.44 लाख वर्गमीटर के चार भूखंड आवंटित किए, ताकि राष्ट्रीय खेलों का आयोजन किया जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्पोर्ट्स सिटी में तीन गोल्फ कोर्स और एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम की परिकल्पना की गई, जबकि हकीकत यह है कि 2008 में पहली स्पोर्ट्स सिटी योजना के शुभारंभ के समय मास्टर प्लान-2021 में स्पोर्ट्स सिटी की कोई श्रेणी नहीं थी। इसे मास्टर प्लान -2031 में शामिल किया गया था, जिसे 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अनुमोदित किया गया था। बिल्डर-प्राधिकरण के इस गठजोड़ ने प्राधिकरण को कंगाली के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। प्राधिकरण को सिर्फ दस फीसदी रकम देकर बिल्डर ने पहले तो लाखों वर्गमीटर जमीन अपने नाम कराई। फिर उसी जमीन को अन्य बिल्डर कंपनियों को बेच दिया।
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सहायक कंपनियों को जमीन देने के नाम पर बिल्डरों ने 500 रुपये के स्टांप पेपर पर ही पूरा खेल कर करोड़ों रुपये की स्टांप ड्यूटी भी हजम कर ली। कुछ कंपनियों ने 500 रुपये भी खर्च करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि 10 रुपये के स्टांप पर ही हजारों वर्गमीटर जमीन पर कब्जा जमा लिया। इससे शासन अनजान बना रहा, वहीं प्राधिकरण अधिकारी मूकदर्शक की भूमिका में रहे। सिर्फ सेक्टर-150 में ही नहीं, बल्कि नोएडा के विभिन्न सेक्टरों में बिल्डरों ने भ्रष्टाचार के इस खेल को स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर खेला है। इससे करीब 500 करोड़ के स्टांप राजस्व की चोरी की गई है।
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ऐसे शुरू हुआ गड़बड़झाला
दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ही नोएडा में भी स्पोर्ट्स सिटी बसाने पर काम शुरू हुआ। प्रदेश सरकार से अनुमोदन के बाद नोएडा के पांच अलग-अलग सेक्टर-78, 79, 150, 101 और 152 में प्राधिकरण ने चार बडे़ बिल्डरों को 33,30,500 वर्गमीटर जमीन सस्ती दर पर 90 साल के लिए लीज पर आवंटित कर दी। यहां भी बिल्डरों को यह छूट दी गई कि उससे जमीन के कुल भुगतान का सिर्फ दस फीसदी जमा कराया गया। बाकी रकम किश्तों में देना तय हुआ। नियम था कि बिल्डर इन जमीन के 28 फीसदी हिस्से पर ही आवासीय सेक्टर विकसित कर सकता है। दो फीसदी जमीन पर उसे व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति थी। शेष 70 फीसदी जमीन पर बिल्डर को आम जनता के लिए खेल सुविधाएं विकसित करनी थीं। प्राधिकरण अधिकारियों से साठगांठ करके बिल्डरों ने इन पांचों सेक्टर में आवंटित भूखंडों को 74 उप विभाजित भूखंडों में तब्दील कराया और फिर अन्य बिल्डरों को उन्हें बेच दिया। इन सभी बिल्डरों को अपनी सहायक कंपनी दर्शाया गया।
स्पोर्ट्स सिटी के सेक्टर-150 में ऐसे बने नए भूखंड
19 दिसंबर 2014 को नोएडा प्राधिकरण ने मैसर्स लोट्स ग्रींस कंस्ट्रक्शंस प्रा.लि. को स्पोर्ट्स सिर्टी विकसित करने के लिए सेक्टर-150 में भूखंड संख्या-एससी-02 की 6.40 लाख वर्गमीटर जमीन की 90 साल की लीज पर दे दिया। 10 फीसदी भुगतान लेकर इसकी लीज डीज भी रजिस्टर्ड कर दी गई। 12.41 अरब से ज्यादा कीमत वाली इस जमीन के लिए बिल्डर ने 75.28 करोड़ की स्टांप ड्यूटी भी दी। इसके बाद कंपनी ने इस जमीन को 12 भूखंडों में बांटकर 12 सहायक बिल्डर कंपनियों के नाम लीज डीड कर दी। इन 12 कंपनियों को जो जमीन दी गई, उनकी लिखा पढ़ी के लिए किसी में 10 रुपये किसी में 100 रुपये और किसी में सिर्फ 500 रुपये के स्टांप पेपर का इस्तेमाल किया गया।
इन 12 बिल्डर कंपनियों को दी गई जमीन
बिल्डर कंपनी का नाम भूखंड (वर्गमीटर में) नया भूखंड नंबर
1. मैसर्स लैंड कार्ट बिल्डर्स प्रा. लि. 83970 एससी-02/ए1
2. मैसर्स बिल्ड वॉल प्रा. लि. 65331 एससी-02/ए2
3. मैसर्स विज टाउन प्रा. लि. 27185 एससी-02/ए3
4. मैसर्स ग्रे वॉल डेवलपर्स प्रा.लि. 46846 एससी-02/ए4
5. मैसर्स ग्रे ब्रिक डेवलपर्स प्रा.लि. 8080 एससी-02/ए5
6. मैसर्स ब्रिक टाउन डेवलपर्स प्रा.लि. 37915 एससी-02/ए6
7. मैसर्स स्ट्रांगबिज प्रोपबुल्ड प्रा.लि. 50790 एससी-02/ए7
8. मैसर्स विशलैंड बिल्डजोन प्रा. 50560 एससी-02/ए8
9. वंडर्स बिल्डमार्ट प्रा.लि. 80857 एससी-02/ए9
10. मैसर्स र्स्कापमेंट बिल्डक्राफ्ट प्रा.लि. 94293 एससी-02/ए10
11. मैसर्स ब्रिकराइज डेवलपर्स प्रा.लि. 72000 एससी-02/ए11
12. मैसर्स फीस्ट होम डेवलपर्स प्रा.लि. 72000 एससी-02/ए12
कंपनी एक्ट के नियमों के साये में हुआ खेल
आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने देश में इंडियन कंपनी एक्ट-1913 को लागू किया था। इसकी अधिसूचना में स्पष्ट था कि यदि कोई मुख्य कंपनी अपनी सहायक कंपनी को अचल संपत्ति ट्रांसफर करती है तो उस पर स्टांप ड्यूटी लागू नहीं होगी। सहायक कंपनी को जो मुनाफा होगा वह मुख्य कंपनी का ही माना जाएगा। इसके बाद 25 मार्च 1942 को कंपनी एक्ट में कुछ संशोधन किया गया, लेकिन इसमें स्टांप ड्यूटी का जिक्र नहीं था। आजादी के बाद 1956 में अधिसूचित कि गए कंपनी एक्ट में भी स्टांप ड्यूटी छूट संबंधी कोई जिक्र नहीं है। 2009 में सरकार ने इसमें संशोधन करके स्पष्ट किया कि 1913 एक्ट की जगह 1956 एक्ट को माना जाए। मौजूदा समय में जो कंपनी एक्ट देश में लागू है उसमें भी स्टांप ड्यूटी छूट संबंधी कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है।

यही कारण है कि मौजूदा कंपनी एक्ट में स्टांप ड्यूटी एक्ट में स्पष्टता न होने से अधिकारी और कुछ बिल्डर इसका दुरुपयोग करके प्रदेश राजस्व को करोड़ों का नुकसान पहुंचा रहे हैं। बिल्डर सहायक कंपनी बनाकर मात्र 100 या 500 रुपये के स्टांप पर लीज डीड तैयार कर देते हैं, जबकि शासन और अधिकारी स्तर पर इस ओर ध्यान दिया जाए तो अब इन बिल्डरों को कुल कीमत का पांच प्रतिशत स्टांप ड्यूटी और एक प्रतिशत रजिस्ट्रेशन चार्ज का भुगतान करना होगा।
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