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प्राधिकरण से मिली छूट तो बिल्डरों ने कमाए अरबों

Sun, 05 Sep 2021 01:24 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 05 Sep 2021 01:24 AM IST
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Builders earned billions after got exemption from authority
नोएडा (सुशील पांडेय) । प्राधिकरण की नीतियों की वजह से मिली छूट के कारण बिल्डरों ने अरबों रुपये कमा लिए। बिल्डरों के समूह (कंसोर्टियम) को बड़े प्लॉट या टाउनशिप के आवंटन में प्राधिकरण ने ही आवंटित जमीन का 70 से 75 प्रतिशत बेचने की भी छूट दी। कई स्कीम में यह छूट अलग-अलग थी। ऐसे में कई स्कीम के ब्रॉशर में मिली छूट का बिल्डरों ने जमकर फायदा उठाया। एक-एक बिल्डर ने अपनी-अपनी आवंटित जमीनों का अधिकांश हिस्सा काफी मुनाफे में बेच दिया। प्राधिकरण खुद ही छोटे प्लॉट बेचता तो उसे फायदा होता, लेकिन फायदा बिल्डरों को हुआ। लोकल फंड ऑडिट की ओर से इस पर गंभीर आपत्ति की भी गई थी। हालांकि, प्राधिकरण के बोर्ड से पास होने की बात कहकर इससे पल्ला झाड़ लिया गया।
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प्राधिकरण के ब्रोशर में यह था, ऐसे हुआ नुकसान
बड़े बिल्डर प्लॉट के आवंटन के समय प्राधिकरण ने जो ब्रोशर जारी किया था, उसमें एक छूट यह मिली थी कि कंसोर्टियम में शामिल बिल्डर चाहे तो वह आवंटित जमीन का 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा बेच सकता है, लेकिन 25 से 30 प्रतिशत हिस्से को उसे खुद ही विकसित करना था। इसके अलावा यह भी नियम था कि कम से कम 20 हजार वर्गमीटर जमीन मुख्य आवंटी के पास होनी चाहिए। उदाहरण के लिए प्राधिकरण ने बिल्डरों के कंसोर्टियम को एक लाख वर्गमीटर जमीन 20 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर की दर से बेची। इस प्रकार बिल्डर को 200 करोड़ रुपये चुकाने थे। बिल्डर ने लीज रेंट और पहली किस्त के चंद रुपये देकर जमीन आवंटित करा ली। इसके बाद उस जमीन के छोटे-छोटे प्लॉट काटकर 70 प्रतिशत हिस्सा यानी 70 हजार वर्गमीटर जमीन 25 से 35 और 40 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर कीमत पर दूसरे बिल्डरों को मनमाने तरीके से बेच दी। इससे बिल्डरों के पास करोड़ों रुपये आ गए, लेकिन प्राधिकरण को उसकी आवंटित जमीन के पैसे भी नहीं मिले। कहीं-कहीं बिल्डरों ने ब्रोशर के नियम भी ताक पर रखकर 80 प्रतिशत तक जमीन बेच दी।
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प्राधिकरण खुद ही छोटे प्लॉट बेचता तो होता फायदा
ऑडिट की आपत्तियों में यह कहा गया था कि अगर प्राधिकरण बड़े प्लॉट की जगह पर खुद ही छोटे प्लॉट बेचता तो उसे ज्यादा पैसे मिलते। इसके अलावा प्लॉट के सब डिविजन का कोई मामला भी नहीं होता, लेकिन प्राधिकरण ने ऐसा नहीं किया और अपना नुकसान खुद ही कराया।
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प्रोजेक्ट नहीं हुए पूरे, छोटे बिल्डर हुए धराशायी
बड़े बिल्डरों ने अपनी आवंटित जमीन छोटे बिल्डरों को बेची, लेकिन छोटे बिल्डर प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर सके। प्राधिकरण की स्पोर्ट्स सिटी परियोजना इसका उदाहरण है जहां 4 बड़े प्लॉट को तोड़कर 42 छोटे प्लॉट बना दिए गए। छोटे बिल्डरों ने काम नहीं किया। बड़े बिल्डर डिफॉल्टर हो गए और परियोजना धराशायी हो गई। प्राधिकरण के करोड़ रुपये भी डूब गए। प्राधिकरण के कई ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्टों में यही हाल है।
प्राधिकरण के नियम भी टूटे
जब प्राधिकरण बड़े बिल्डर प्लॉट का आवंटन करता है तो उसे जमीन आवंटन से पहले कई शर्तों से गुजरना होता है। इसमें बिल्डर का अनुभव, उपलब्ध संसाधन, बैंक गारंटी सहित कई ऐसी चीजें हैं जिसमें खरे नहीं उतरने पर बिल्डर को जमीन नहीं मिलती। इन्हीं बिल्डरों ने अनुभवहीन बिल्डरों को जमीनों का आवंटन कर दिया। इससे प्राधिकरण के नियम भी टूट गए और प्रोजेक्ट बिखर गया। जगह-जगह इसी तरह के अधूरे बिल्डर प्रोजेक्टों में खरीदार फंसे हुए हैं।

नियोजन में भी हुई दिक्कत
जब भी प्राधिकरण किसी बड़े प्लॉट को बेचता है तो नियोजन विभाग की ओर से उक्त प्लॉट पर संसाधनों का विकास किया जाता है। संसाधन बड़े प्लॉट के लिए विकसित किए जाते हैं, लेकिन जब बिल्डरों ने बड़े प्लॉट के टुकड़े कर दिए और दूसरे बिल्डरों ने वहां जब अपनी-अपनी प्लानिंग शुरू की तो वहां सीवर, बिजली, पानी सहित अन्य संसाधनोें के विकास में काफी दिक्कतें पेश आईं। सवाल उठता है कि फिर इन प्रोजेक्टों का कंप्लीशन नियोजन विभाग कैसे देता है।
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