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एक्सप्रेसवे के रिसर्फेसिंग के काम में लेटलतीफी पर 75 लाख का जुर्माना

Tue, 03 May 2022 02:06 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 03 May 2022 02:06 AM IST
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75 lakh fine for delay in resurfacing work of expressway
नोएडा। नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे के 20 किलोमीटर के रिसर्फेसिंग के काम में लेटलतीफी को गंभीरता से लेते हुए प्राधिकरण ने एजेंसी पर 75 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। इससे पहले पिछली कई डेडलाइन पर काम पूरे न होने पर एजेंसी पर पहले से ही 97 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा चुका है। इस तरह से अब तक 1.72 करोड़ का जुर्माना किया जा चुका है।
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दरअसल, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे की दोनों कैरेज की सड़क काफी पहले टूट चुकी थी। इसकी मरम्मत की मांग की जा रही थी। लिहाजा प्राधिकरण ने टेंडर के माध्यम से काम एक एजेंसी को सौंपा। एजेंसी ने काम पूरे करने के लिए कई दावे किए, लेकिन आलम यह है कि अब तक काम पूरा नहीं हुआ। एजेंसी ने कभी बारिश तो कभी सर्दी का तर्क देते हुए काम टाले। वर्तमान में मशीन खराब होने की बात की जा रही है। लिहाजा कई दिन से काम बंद है। इसका असर यह है कि जब भी काम शुरू होता है तो एक-एक लेन में बैरिकेडिंग कर दी जाती है। इसके बाद काम चलता रहता है। ऐसे में एक्सप्रेसवे पर वाहनों की गति सीमा पर असर पड़ता है। इसका खामियाजा जाम के रूप में भुगतना पड़ता है। बैरिकेडिंग की वजह से एक बार दुर्घटना का मामला भी सामने आ चुका है। वर्क सर्किल-10 के वरिष्ठ प्रबंधक केवी सिंह ने कहा कि एजेंसी ने तय समय पर काम पूरा नहीं किया। लिहाजा 75 लाख का जुर्माना किया गया है।
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2019 से शुरू हुई टेंडर प्रक्रिया
2019 से निर्माण की प्रारंभिक गतिविधियों के तहत टेंडर और एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट आदि की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन कोरोना के कारण काम ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद जनवरी 2021 से इसका काम शुरू किया गया है।
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20 से 30 प्रतिशत पुरानी सामग्री का हो रहा इस्तेमाल
अधिकारियों के मुताबिक प्रति किलोमीटर पर कोर कटिंग के बाद यह पता लगाया गया कि पुराना मैटेरियल नए निर्माण में कितना कारगर साबित होगा। इस आधार पर सबसे बेहतरीन मैटेरियल का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा उपयोग में लाया जाएगा।

31 करोड़ रुपये की बचत का किया था दावा
नई तकनीक से काम करने में प्राधिकरण को 31 करोड़ रुपये की बचत होगी। काम शुरू करने से पहले यह दावा किया गया था। अधिकारियों का कहना था कि पुरानी पद्धति से काम किया जाता तो इसकी लागत 92 करोड़ आती। जबकि, नई तकनीक से निर्माण में 61 करोड़ रुपये में काम हो जाएगा।
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