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वाटरलू सीट तावडू अपना अस्तित्व खोने लगी
Updated Mon, 06 Aug 2018 08:36 PM IST
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वाटरलू सीट तावडू अपना अस्तित्व खोने लगी
- विधानसभा सोहना व जिला नूंह होने से हर मामले में हो रही बेकदरी
- 2009 में परिसीमन के बाद सोहना में शामिल होने से क्षेत्र का नहीं हो पा रहा विकास
अमर उजाला ब्यूरो
तावडू। परिसीमन से पहले मेवात विधानसभा का हिस्सा रहे तावडू को आज कोई पूछने वाला नहीं है। इसकी न तो अपनी विधानसभा है और न ही इसे नूंह से जोड़ा गया है। वाटरलू रही इस सीट को साल 2009 परिसीमन के दौरान समाप्त कर गुरुग्राम जिला के उपमंडल सोहना विधानसभा में शामिल कर दिया गया।
यहां यह बताना जरूरी है कि परिसीमन से पूर्व 2005 तक तावडू विधानसभा नूंह जिला का हिस्सा था। वर्ष 1977 में बनी विधानसभा से चुने गये प्रतिनिधि सरकार में महत्वपूर्ण ओहदे पर मंत्री पद हासिल कर चुके हैं। परिसीमन होने के समय कहा गया था कि एक ब्लॉक व एक जिला में ही विधानसभा होगी। लेकिन परिसीमन आयोग की कथित लापरवाही से विधानसभा जिला गुरुग्राम में है। जबकि तावडू उपमंडल नूंह जिला का हिस्सा है। जिला स्तर के कार्यों के लिए उपमंडल वासियों को नूंह में जाना पड़ रहा है। इससे क्षेत्रवासी स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि परिसीमन के दौरान नूंह जिला की पुन्हाना विधानसभा में मतदाताओं की संख्या तावडू उपमंडल से कम होने के बावजूद उसे विधानसभा बना दिया गया। जबकि तावडू को खत्म कर सोहना विधानसभा में शामिल कर दिया गया। इससे क्षेत्र के विकास की रफ्तार थम सी गई है। विधानसभा सोहना व जिला नूंह होने से उनकी हर मामले में बेकदरी ही हो रही है।
सामाजिक नेता राजेंद्र सिंह, अधिवक्ता रमजा चौधरी, पूर्व ब्लाक चेयरमैन अब्बास खान, नंबरदार यूनुस, नंबरदार समसुद्दीन आदि ने बताया कि 9 साल पूर्व नूंह का हिस्सा रही तावडू विधानसभा का सोहना में शामिल होने से अस्तित्व मिटता ही जा रहा है। उन्होंने बताया कि तावडू सूबे की वाटरलू सीट रही है और यहां से चुने गये प्रतिनिधियों की सरकार में तूती बोलती थी, लेकिन तावडू से कम मतदाताओं वाले पुन्हाना क्षेत्र को नई विधानसभा का रूप दे दिया गया। उन्होंने बताया कि मौजूदा दौर में पार्टी विधायक होने के बावजूद शहर व चौरासी वासियों को अब तक कुछ नहीं मिल सका है।
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- विधानसभा सोहना व जिला नूंह होने से हर मामले में हो रही बेकदरी
- 2009 में परिसीमन के बाद सोहना में शामिल होने से क्षेत्र का नहीं हो पा रहा विकास
अमर उजाला ब्यूरो
तावडू। परिसीमन से पहले मेवात विधानसभा का हिस्सा रहे तावडू को आज कोई पूछने वाला नहीं है। इसकी न तो अपनी विधानसभा है और न ही इसे नूंह से जोड़ा गया है। वाटरलू रही इस सीट को साल 2009 परिसीमन के दौरान समाप्त कर गुरुग्राम जिला के उपमंडल सोहना विधानसभा में शामिल कर दिया गया।
यहां यह बताना जरूरी है कि परिसीमन से पूर्व 2005 तक तावडू विधानसभा नूंह जिला का हिस्सा था। वर्ष 1977 में बनी विधानसभा से चुने गये प्रतिनिधि सरकार में महत्वपूर्ण ओहदे पर मंत्री पद हासिल कर चुके हैं। परिसीमन होने के समय कहा गया था कि एक ब्लॉक व एक जिला में ही विधानसभा होगी। लेकिन परिसीमन आयोग की कथित लापरवाही से विधानसभा जिला गुरुग्राम में है। जबकि तावडू उपमंडल नूंह जिला का हिस्सा है। जिला स्तर के कार्यों के लिए उपमंडल वासियों को नूंह में जाना पड़ रहा है। इससे क्षेत्रवासी स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि परिसीमन के दौरान नूंह जिला की पुन्हाना विधानसभा में मतदाताओं की संख्या तावडू उपमंडल से कम होने के बावजूद उसे विधानसभा बना दिया गया। जबकि तावडू को खत्म कर सोहना विधानसभा में शामिल कर दिया गया। इससे क्षेत्र के विकास की रफ्तार थम सी गई है। विधानसभा सोहना व जिला नूंह होने से उनकी हर मामले में बेकदरी ही हो रही है।
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सामाजिक नेता राजेंद्र सिंह, अधिवक्ता रमजा चौधरी, पूर्व ब्लाक चेयरमैन अब्बास खान, नंबरदार यूनुस, नंबरदार समसुद्दीन आदि ने बताया कि 9 साल पूर्व नूंह का हिस्सा रही तावडू विधानसभा का सोहना में शामिल होने से अस्तित्व मिटता ही जा रहा है। उन्होंने बताया कि तावडू सूबे की वाटरलू सीट रही है और यहां से चुने गये प्रतिनिधियों की सरकार में तूती बोलती थी, लेकिन तावडू से कम मतदाताओं वाले पुन्हाना क्षेत्र को नई विधानसभा का रूप दे दिया गया। उन्होंने बताया कि मौजूदा दौर में पार्टी विधायक होने के बावजूद शहर व चौरासी वासियों को अब तक कुछ नहीं मिल सका है।
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