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Noida News: अड़बर गांव में प्यास से तड़प रहीं 5000 जिंदगियां, प्रशासन बेखबर
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- पानी के नाम पर हर माह 10 लाख की लूट, पांच साल से सूखी पड़ी हैं टोंटियां, सरकारी दावे खोखले
रिजवान खान
नूंह। अड़बर गांव की एक हज़ार से अधिक घरों वाली उमराव बस्ती में पिछले करीब पांच साल से पीने के पानी की एक बूंद भी नसीब नहीं हुई। जिन टोंटियों से कभी बच्चों की किलकारियां और औरतों की चहल-पहल सुनाई देती थी, आज वहां सिर्फ़ सूखी पाइपलाइन और सरकारी सिस्टम की खामोशी पसरी हुई है। मजबूरी ऐसी कि ग्रामीणों को पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है, और हर महीने लाखों रुपये सिर्फ प्यास बुझाने में खर्च हो रहे हैं।
-चैंबर बने, पानी नहीं आया
ग्रामीणों के अनुसार पूरे गांव की करीब 18 हजार आबादी के लिए विभाग द्वारा चार पानी के चैंबर बनाए गए थे। उद्देश्य था हर बस्ती तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना, लेकिन हकीकत यह है कि ये चैंबर आज सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं। बीते आठ वर्षों में इन चैंबरों में एक बार भी नियमित पानी सप्लाई नहीं हुई। विभागीय अनदेखी ने लोगों को पानी के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है।
- टैंकर माफिया पर निर्भर ज़िंदगी
चैंबरों नंबर चार में पानी न होने के कारण ग्रामीणों को निजी टैंकरों का सहारा लेना पड़ता है। एक टैंकर के लिए 1200 से 1500 रुपये चुकाने पड़ते हैं, जो मुश्किल से 15-20 दिन चलता है। अगर पूरे मोहल्ले का हिसाब लगाया जाए तो यह बस्ती हर महीने 10 लाख रुपये से ज़्यादा सिर्फ पीने के पानी पर खर्च कर रही है। यह रकम किसी छोटे गांव के विकास बजट से कम नहीं।
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- घटिया गुणवत्ता के पानी से बीमारी का डर
पानी की कमी ने महिलाओं, बुज़ुर्गों और बच्चों की ज़िंदगी सबसे ज़्यादा मुश्किल कर दी है। गर्मी के मौसम में हालात और भयावह हो जाते हैं। कई परिवारों ने बताया कि मजबूरी में कभी-कभी घटिया गुणवत्ता का पानी भी इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे बीमारियों का खतरा बना रहता है। अड़बर गांव की यह प्यास सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि सिस्टम से जवाब की भी है। सवाल यह है—क्या प्रशासन इस सूखी बस्ती की चीख सुन पाएगा, या प्यास यूं ही सालों तक लोगों की किस्मत बनी रहेगी?
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पांच साल हो गए, हर बार प्रशासन व जिम्मेदारों से वादा मिलता है, लेकिन पानी नहीं। क्या हमारी प्यास की कोई कीमत नहीं।
- इसराइल, ग्रामीण।
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अब तो आलम यह हो गया है कि हम मजदूरी करके पानी खरीद रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई छोड़कर टैंकर के पैसे जुटाने पड़ते हैं। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है।
- जाकिर, ग्रामीण।
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बस्ती में पानी का चैम्बर सिर्फ दिखावे के लिए बनाया हुआ है। अभी तीन दिन पहले पानी आया जो बिल्कुल खारी था। ना तो उसे पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और ना ही किसी और काम में।
- वकील खान, ग्रामीण।
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हम अधिकारियों को ढूंढते फिरते हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। अब मजबूरी में आंदोलन ही रास्ता बचा है। हमारी मांग है कि जल्द पीने के पानी की उचित व्यवस्था कराई जाए।
- इमरान खान, ग्रामीण।
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वर्जन रेनीवेल का पानी गांव में नहीं पहुंच पा रहा है लेकिन ट्यूबवेल के जरिए गांवों तक पानी पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीण अगर खारे पानी की शिकायत कर रहे हैं तो टीम भेज कर पानी की जांच कराई जाएगी और गांव के लोगों को शुद्ध हुए पीने योग्य पानी पहुंचाया जाएगा।
- विनय प्रकाश चौहान, एक्सईएन, पब्लिक हेल्थ, नूंह।
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रिजवान खान
नूंह। अड़बर गांव की एक हज़ार से अधिक घरों वाली उमराव बस्ती में पिछले करीब पांच साल से पीने के पानी की एक बूंद भी नसीब नहीं हुई। जिन टोंटियों से कभी बच्चों की किलकारियां और औरतों की चहल-पहल सुनाई देती थी, आज वहां सिर्फ़ सूखी पाइपलाइन और सरकारी सिस्टम की खामोशी पसरी हुई है। मजबूरी ऐसी कि ग्रामीणों को पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है, और हर महीने लाखों रुपये सिर्फ प्यास बुझाने में खर्च हो रहे हैं।
-चैंबर बने, पानी नहीं आया
ग्रामीणों के अनुसार पूरे गांव की करीब 18 हजार आबादी के लिए विभाग द्वारा चार पानी के चैंबर बनाए गए थे। उद्देश्य था हर बस्ती तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना, लेकिन हकीकत यह है कि ये चैंबर आज सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं। बीते आठ वर्षों में इन चैंबरों में एक बार भी नियमित पानी सप्लाई नहीं हुई। विभागीय अनदेखी ने लोगों को पानी के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है।
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- टैंकर माफिया पर निर्भर ज़िंदगी
चैंबरों नंबर चार में पानी न होने के कारण ग्रामीणों को निजी टैंकरों का सहारा लेना पड़ता है। एक टैंकर के लिए 1200 से 1500 रुपये चुकाने पड़ते हैं, जो मुश्किल से 15-20 दिन चलता है। अगर पूरे मोहल्ले का हिसाब लगाया जाए तो यह बस्ती हर महीने 10 लाख रुपये से ज़्यादा सिर्फ पीने के पानी पर खर्च कर रही है। यह रकम किसी छोटे गांव के विकास बजट से कम नहीं।
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- घटिया गुणवत्ता के पानी से बीमारी का डर
पानी की कमी ने महिलाओं, बुज़ुर्गों और बच्चों की ज़िंदगी सबसे ज़्यादा मुश्किल कर दी है। गर्मी के मौसम में हालात और भयावह हो जाते हैं। कई परिवारों ने बताया कि मजबूरी में कभी-कभी घटिया गुणवत्ता का पानी भी इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे बीमारियों का खतरा बना रहता है। अड़बर गांव की यह प्यास सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि सिस्टम से जवाब की भी है। सवाल यह है—क्या प्रशासन इस सूखी बस्ती की चीख सुन पाएगा, या प्यास यूं ही सालों तक लोगों की किस्मत बनी रहेगी?
पांच साल हो गए, हर बार प्रशासन व जिम्मेदारों से वादा मिलता है, लेकिन पानी नहीं। क्या हमारी प्यास की कोई कीमत नहीं।
- इसराइल, ग्रामीण।
अब तो आलम यह हो गया है कि हम मजदूरी करके पानी खरीद रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई छोड़कर टैंकर के पैसे जुटाने पड़ते हैं। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है।
- जाकिर, ग्रामीण।
बस्ती में पानी का चैम्बर सिर्फ दिखावे के लिए बनाया हुआ है। अभी तीन दिन पहले पानी आया जो बिल्कुल खारी था। ना तो उसे पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और ना ही किसी और काम में।
- वकील खान, ग्रामीण।
हम अधिकारियों को ढूंढते फिरते हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। अब मजबूरी में आंदोलन ही रास्ता बचा है। हमारी मांग है कि जल्द पीने के पानी की उचित व्यवस्था कराई जाए।
- इमरान खान, ग्रामीण।
वर्जन रेनीवेल का पानी गांव में नहीं पहुंच पा रहा है लेकिन ट्यूबवेल के जरिए गांवों तक पानी पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीण अगर खारे पानी की शिकायत कर रहे हैं तो टीम भेज कर पानी की जांच कराई जाएगी और गांव के लोगों को शुद्ध हुए पीने योग्य पानी पहुंचाया जाएगा।
- विनय प्रकाश चौहान, एक्सईएन, पब्लिक हेल्थ, नूंह।