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ससुर, जेठ, देवर और पति के आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी अधूरी
Updated Tue, 14 Aug 2018 11:40 PM IST
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ससुर, जेठ, देवर और पति के आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी अधूरी
नगीना। 'अंगूठा टेक रहे न एकज्' ये नारा लंबे समय से समाज को शिक्षा की अहमियत समझाता आ रहा है। इसके बावजूद पढ़ी-लिखी ग्राम पंचायतें ससुर, जेठ, देवर और पति के आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी अधूरी है। सरकारी चौधराहट की इस जंग की शिकार काफी महिला सरपंच भी नजर आती हैं। पंचायतों में धरातल पर इसका कोई असर विकास कार्यों में नजर नहीं आया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के दौरान आपसी मतभेद के चलते 105 शिकायतें पिछले ढाई साल में पंचायत विभाग के अधिकारियों तक पहुंची हैं। शिकायतों में स्पष्ट लिखा है कि ससुर, जेठ, देवर, पति ने रौब जमाया। तभी विवाद यहां तक पहुंचा। प्रदेश में पहली बार 2016 में पढ़ी-लिखी पंचायतें चुनकर आईं। सरकार को उम्मीद की थी कि गांवों के विकास में अमूलचूक परिवर्तन आएगा किंतु आजादी के 72 वर्ष बाद भी चयनित पंच-सरपंच घूंघट से
बाहर निकल नहीं सकी है। ग्रामसभा से लेकर सरकारी बैठकों में उनका नाम तो आता है लेकिन दबदबा देवर, पति और ससुर का बरकरार है। ऐसी अनगिनत बैठके हुई हैं जिनमें सरपंच के स्थान पर उनके परिवार के सदस्यों ने न केवल भाग लिया बल्कि ये भी साबित किया है कि वे खुद सरपंच हैं। ऐसा कई बार हो चुका है जब अधिकारियों ने ेचुने हुए प्रतिनिधि के स्थान पर पहुंचे लोगों को बैठक से बाहर ही निकाल दिया। जिला नूंह में भी दो बार तत्कालीन डीसी मनीराम शर्मा ने ऐसे प्रतिनिधियों को सख्त हिदायत दी थी जिनके स्थान पर उनके परिवार के सदस्य जिला प्रशासन की बैठकों में बिना रोक-टोक पहुंच जाते थे।
इमामनगर गांव के जागरूक मतदाता इलियास प्रधान व खेड़लीकलां गांव के ताहिर हुसैन बताते है कि पुरुष प्रधान समाज में अभी महिला पंच-सरपंच को चुनने के बाद भी कानूनन अधिकार तो है लेकिन उनका उपयोग उनके परिवार के लोग करते हैं। उनके गांव की सरपंच नाईनंगला गांव की सरपंच संगीता बताती हैं कि अभी भी उन्हें सीमित दायरे में ही बैठकों में जाने की अनुमति है। घूंघट बड़े बुजर्गों से करना अदब की संस्कृति है कोई जबरदस्ती नहीं है। अटेरना गांव की जेबीटी सरपंच जाइदा कहती हैं कि परिवार जहां जरूरी होता है वहां बैठकों में भेज देता है। जबकि ग्राम सभा की बैठकों में नियमित तौर पर मेरी उपस्थिति होती है। मांडीखेडा गांव में करीब 3 महिने पहले हुई एक ग्रामसभा में चुनी पंच व सरपंच घूंघट में कैद दिखी पढ़ी-लिखी ग्राम पंचायतों पर सवाल उठने लगे। ग्राम सचिव बाबू लाल बताते है कि नगीना खंड में 54 पंचायतें है उनमें इमामनगर, नाईनंगला और रनियाला पटाकपुर के सरपंच व अन्य पंचों को निर्विरोध चुना गया। सरकार ने पंच को 50 हजार और सरपंच को 1 लाख रुपये देने का अपना वादा इन गांवों में पूरा कर दिया है। जो
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पंचायत निर्विरोध चुनी उन्हें 11 लाख रुपये का अनुदान विकास कार्यों के लिए अलग से मिला। जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी राकेश मोर ने बताया कि ग्रामसभाओं और जिला प्रशासन की बैठकों में उपस्थित होने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों को पहुंचने के आदेश दिए हुए है। यदि उनके स्थान पर कोई आता है तो उसको गैरहाजिर माना जाएगा।
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नगीना। 'अंगूठा टेक रहे न एकज्' ये नारा लंबे समय से समाज को शिक्षा की अहमियत समझाता आ रहा है। इसके बावजूद पढ़ी-लिखी ग्राम पंचायतें ससुर, जेठ, देवर और पति के आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी अधूरी है। सरकारी चौधराहट की इस जंग की शिकार काफी महिला सरपंच भी नजर आती हैं। पंचायतों में धरातल पर इसका कोई असर विकास कार्यों में नजर नहीं आया। ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के दौरान आपसी मतभेद के चलते 105 शिकायतें पिछले ढाई साल में पंचायत विभाग के अधिकारियों तक पहुंची हैं। शिकायतों में स्पष्ट लिखा है कि ससुर, जेठ, देवर, पति ने रौब जमाया। तभी विवाद यहां तक पहुंचा। प्रदेश में पहली बार 2016 में पढ़ी-लिखी पंचायतें चुनकर आईं। सरकार को उम्मीद की थी कि गांवों के विकास में अमूलचूक परिवर्तन आएगा किंतु आजादी के 72 वर्ष बाद भी चयनित पंच-सरपंच घूंघट से
बाहर निकल नहीं सकी है। ग्रामसभा से लेकर सरकारी बैठकों में उनका नाम तो आता है लेकिन दबदबा देवर, पति और ससुर का बरकरार है। ऐसी अनगिनत बैठके हुई हैं जिनमें सरपंच के स्थान पर उनके परिवार के सदस्यों ने न केवल भाग लिया बल्कि ये भी साबित किया है कि वे खुद सरपंच हैं। ऐसा कई बार हो चुका है जब अधिकारियों ने ेचुने हुए प्रतिनिधि के स्थान पर पहुंचे लोगों को बैठक से बाहर ही निकाल दिया। जिला नूंह में भी दो बार तत्कालीन डीसी मनीराम शर्मा ने ऐसे प्रतिनिधियों को सख्त हिदायत दी थी जिनके स्थान पर उनके परिवार के सदस्य जिला प्रशासन की बैठकों में बिना रोक-टोक पहुंच जाते थे।
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इमामनगर गांव के जागरूक मतदाता इलियास प्रधान व खेड़लीकलां गांव के ताहिर हुसैन बताते है कि पुरुष प्रधान समाज में अभी महिला पंच-सरपंच को चुनने के बाद भी कानूनन अधिकार तो है लेकिन उनका उपयोग उनके परिवार के लोग करते हैं। उनके गांव की सरपंच नाईनंगला गांव की सरपंच संगीता बताती हैं कि अभी भी उन्हें सीमित दायरे में ही बैठकों में जाने की अनुमति है। घूंघट बड़े बुजर्गों से करना अदब की संस्कृति है कोई जबरदस्ती नहीं है। अटेरना गांव की जेबीटी सरपंच जाइदा कहती हैं कि परिवार जहां जरूरी होता है वहां बैठकों में भेज देता है। जबकि ग्राम सभा की बैठकों में नियमित तौर पर मेरी उपस्थिति होती है। मांडीखेडा गांव में करीब 3 महिने पहले हुई एक ग्रामसभा में चुनी पंच व सरपंच घूंघट में कैद दिखी पढ़ी-लिखी ग्राम पंचायतों पर सवाल उठने लगे। ग्राम सचिव बाबू लाल बताते है कि नगीना खंड में 54 पंचायतें है उनमें इमामनगर, नाईनंगला और रनियाला पटाकपुर के सरपंच व अन्य पंचों को निर्विरोध चुना गया। सरकार ने पंच को 50 हजार और सरपंच को 1 लाख रुपये देने का अपना वादा इन गांवों में पूरा कर दिया है। जो
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पंचायत निर्विरोध चुनी उन्हें 11 लाख रुपये का अनुदान विकास कार्यों के लिए अलग से मिला। जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी राकेश मोर ने बताया कि ग्रामसभाओं और जिला प्रशासन की बैठकों में उपस्थित होने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों को पहुंचने के आदेश दिए हुए है। यदि उनके स्थान पर कोई आता है तो उसको गैरहाजिर माना जाएगा।