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एम्स का कारनामा, एक और मरीजको छोड़ा बेसहारा
Updated Wed, 10 Oct 2018 06:32 AM IST
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एम्स का कारनामा, एक और मरीज को छोड़ा बेसहारा
- इलाज करने के बाद दोबारा दिक्कत होने पर नहीं किया दाखिल
- मरीज फिलहाल लोकनायक अस्पताल में भर्ती
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स को लेकर कहा जाता है कि एक बार यहां भर्ती होने के बाद मरीज को पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है, लेकिन कुछ समय से देखने को मिल रहा है कि एम्स में भर्ती होने के बाद भी मरीज की हालत नहंी सुधरती है तो उसे डिस्चॉर्ज कर दिया जाता है। ऐसे ही आरोप दिल्ली के नंदनगरी निवासी संदीप ने लगाए हैं। उनका कहना है कि पथरी से परेशान उनकी 34 वर्षीय बहन को उन्होंने एम्स में भर्ती कराया लेकिन तमाम जांच होने के बाद जब हालत नहंी सुधरी तो दो दिन बाद बिस्तर की कमी दिखाकर उसे डिस्चॉर्ज कर दिया गया।
संदीप ने बताया कि उनकी बहन नीतू को पित्त की थैली में पथरी की परेशानी है। एक अक्तूबर को एम्स के ओपीडी में दिखाने के बाद इमरजेंसी में डॉक्टरों ने भर्ती कराया। तीन अक्तूबर को नीतू की ईआरसीपी हुई। संदीप की मानें तो ईआरसीपी के 48 घंटे बाद भी नीतू की हालत ठीक नहीं होने के बाद भी अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। 24 घंटे के अंदर ही उसे दोबारा इमरजेंसी में भर्ती करना पड़ा, लेकिन इस बार भी हालत में सुधार नहीं होने के बाद भी सोमवार की शाम को बेड नहीं होने की वजह बताते हुए छुट्टी कर दी गई।
मरीज को लेकर वे कई अस्पतालों में पहुंचे वहां उन्होंने एम्स का कार्ड दिखाते हुए मरीज की केस हिस्ट्री भी डॉक्टरों को बताई, लेकिन कहीं भी मरीज को इलाज नहीं मिला। दो दिन पहले ही उनके मरीज को लोकनायक अस्पताल में भर्ती किया है, जहां उसका उपचार चल रहा है।
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दरअसल एम्स में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई मरीज इसी तरह ऑपरेशन के बाद तबीयत खराब होने पर भी बेड नहीं होने के नाम पर निकाला जा चुका हैं। एम्स प्रशासन से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।
दिल्ली के अस्पतालों में नहीं ईआरसीपी
संदीप ने बताया कि वे अपनी बहन को लेकर अब दिल्ली के छह बड़े सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगा चुके हैं। महीना भर पहले जब नीतू को अचानक पेट में दर्द हो गया तो उसे तत्काल ही पास के स्वामी दयानंद अस्पताल ले गए। वहां अल्ट्रासाउंड में पता चला कि नीतू के पित्त की थैली पथरी है। इसके लिए ईआरसीपी करने की जरूरत थी, लेकिन वहां इसकी सुविधा उपलब्ध नहीं होने की वजह से उसे पास के ही राजीव गांधी अस्पताल में रेफर किया गया। वहां भी सुविधा नहीं मिली तो जीबी पंत, आरएमएल पहुंचे। यहां भी मशीन खराब होने का हवाला दिया था। इसके चलते ही उन्हें एम्स पहुंचा पड़ा।
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- इलाज करने के बाद दोबारा दिक्कत होने पर नहीं किया दाखिल
- मरीज फिलहाल लोकनायक अस्पताल में भर्ती
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स को लेकर कहा जाता है कि एक बार यहां भर्ती होने के बाद मरीज को पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है, लेकिन कुछ समय से देखने को मिल रहा है कि एम्स में भर्ती होने के बाद भी मरीज की हालत नहंी सुधरती है तो उसे डिस्चॉर्ज कर दिया जाता है। ऐसे ही आरोप दिल्ली के नंदनगरी निवासी संदीप ने लगाए हैं। उनका कहना है कि पथरी से परेशान उनकी 34 वर्षीय बहन को उन्होंने एम्स में भर्ती कराया लेकिन तमाम जांच होने के बाद जब हालत नहंी सुधरी तो दो दिन बाद बिस्तर की कमी दिखाकर उसे डिस्चॉर्ज कर दिया गया।
संदीप ने बताया कि उनकी बहन नीतू को पित्त की थैली में पथरी की परेशानी है। एक अक्तूबर को एम्स के ओपीडी में दिखाने के बाद इमरजेंसी में डॉक्टरों ने भर्ती कराया। तीन अक्तूबर को नीतू की ईआरसीपी हुई। संदीप की मानें तो ईआरसीपी के 48 घंटे बाद भी नीतू की हालत ठीक नहीं होने के बाद भी अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। 24 घंटे के अंदर ही उसे दोबारा इमरजेंसी में भर्ती करना पड़ा, लेकिन इस बार भी हालत में सुधार नहीं होने के बाद भी सोमवार की शाम को बेड नहीं होने की वजह बताते हुए छुट्टी कर दी गई।
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मरीज को लेकर वे कई अस्पतालों में पहुंचे वहां उन्होंने एम्स का कार्ड दिखाते हुए मरीज की केस हिस्ट्री भी डॉक्टरों को बताई, लेकिन कहीं भी मरीज को इलाज नहीं मिला। दो दिन पहले ही उनके मरीज को लोकनायक अस्पताल में भर्ती किया है, जहां उसका उपचार चल रहा है।
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दरअसल एम्स में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई मरीज इसी तरह ऑपरेशन के बाद तबीयत खराब होने पर भी बेड नहीं होने के नाम पर निकाला जा चुका हैं। एम्स प्रशासन से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।
दिल्ली के अस्पतालों में नहीं ईआरसीपी
संदीप ने बताया कि वे अपनी बहन को लेकर अब दिल्ली के छह बड़े सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगा चुके हैं। महीना भर पहले जब नीतू को अचानक पेट में दर्द हो गया तो उसे तत्काल ही पास के स्वामी दयानंद अस्पताल ले गए। वहां अल्ट्रासाउंड में पता चला कि नीतू के पित्त की थैली पथरी है। इसके लिए ईआरसीपी करने की जरूरत थी, लेकिन वहां इसकी सुविधा उपलब्ध नहीं होने की वजह से उसे पास के ही राजीव गांधी अस्पताल में रेफर किया गया। वहां भी सुविधा नहीं मिली तो जीबी पंत, आरएमएल पहुंचे। यहां भी मशीन खराब होने का हवाला दिया था। इसके चलते ही उन्हें एम्स पहुंचा पड़ा।