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नोबेल पुरस्कार पर क्या बोली सत्यार्थी की बेटी?

Sat, 11 Oct 2014 02:53 PM IST
Updated Sat, 11 Oct 2014 02:53 PM IST
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nobel prize winner satyarthi's daughter's comment.

जाने माने समाजसेवी और बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी की बेटी अस्मिता ने पिता को नोबेल पुरस्कार मिलने पर खुशी जताते हुए कहा कि पिछले 30-35 साल से लगातार किए जा रहे उनके कामों और प्रयासों की यह सही पहचान है।

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अस्मिता ने कहा कि उनके परिवार के लिए यह बेहद खुशी और गर्व की बात है कि उनको इतना बड़ा सम्मान मिला है। हमें इस पर आश्चर्य भी है कि वह इस मुकाम तक पहुंच गए हैं।
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हम उनके एनजीओ से बचपन से ही जुडे हैं। अस्मिता ने कहा कि उनके पिता ने बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपना करियर छोड़ दिया और बचपन बचाओ आंदोलन शुरू किया, जो उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है।
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'बदल दी हजारों बच्चों की जिंदगी'

nobel prize winner satyarthi's daughter's comment.

अस्मिता ने बताया कि उसके पिता ने पहले बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अभियान छेड़ा और फिर देशभर से बच्चों को आजाद कराया। उनकी इस मुहिम ने बच्चों हजारों बच्चों की जिंदगी बदल दी।

एएनआई के मुताबिक, उन्होंने बाल मजदूरी को एक मुद्दा बनाया जोकि पहले दूरी दुनिया में दबा हुआ था और मासूम बच्चों को सताया जाता था। लेकिन उनके पिता ने अपनी लगन से इसे बदलने में कामयाबी पाई और हजारों बच्चों को मुक्त कराया।

इस बीच, राजधानी के बच्चों ने भी सत्यार्थी के प्रयासों की प्रशंसा की है। 8 साल के विकास कुमार ने कहा कि यह उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि बच्चे आज पढ़ रहे हैं, उन्हें काम नहीं करना पड़ रहा वरना पढ़ाई की उम्र में वे मजदूरी करते नजर आते थे। सत्यार्थी को यह पुरस्कार मिलना वाजिब है।

पहली बार हुआ है ऐसा

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एक और बच्चे मुनि राज ने कहा कि बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले को ये पुरस्कार मिला सम्मान की बात है। इससे उनका मनोबल बढ़ेगा और बच्चों के हितों के लिए उनकी लड़ाई को नई ऊर्जा मिलेगी। बच्चों का अपहरण करके उनके साथ ज्यादती करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

बता दें कि बचपन बचाओ आंदोलन की मुहिम शुरू करने वाले कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की एक्टिविस्ट मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

यह पुरस्कार, 'बच्चों और युवाओं के हितों की रक्षा करने और बच्चों को शिक्षा देने के प्रयास करने' के लिए दिया गया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि एक भारत और एक पाकिस्तानी को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिला है।

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