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अब समय पर हो पाएगी ग्लायोमा ट्यूमर की पहचान, नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर और बीएचयू ने निकाली तकनीक

Wed, 28 Aug 2019 04:03 PM IST
Prachi Priyam न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा Published by: Prachi Priyam Updated Wed, 28 Aug 2019 04:03 PM IST
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National Brain Research center and BHU develops technique to identify Glioma Tumor
सांकेतिक तस्वीर

मस्तिष्क से जुड़े ग्लायोमा कैंसर की पहचान अब सही समय पर और बेहद आसानी से हो पाएगी। मानेसर स्थित नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू)-आईआईटी के विशेषज्ञों ने मिलकर डिफ्यूजन टेंसर इमेजिंग (डीटीआई) के जरिए ग्लायोमा ट्यूमर की पहचान का आसान तरीका निकाला है।

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मस्तिष्क में ग्लायोमा ट्यूमर का फैलाव पहचानना बेहद मुश्किल होता है। कई बार एमआरआई या सीटी स्कैन से भी डॉक्टर इसे समझ नहीं पाते। इंसान के मस्तिष्क में ये ट्यूमर काफी तेजी से फैलता है। ये एक से दूसरे छोर तक भी पहुंच सकता है। 
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नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. विकास पारीक बताते हैं कि मस्तिष्क में सफेद पदार्थ के साथ पानी के अणुओं की स्थिति का पता डिफ्यूजन टेंसर इमेजिंग (डीटीआई) से चल जाता है, जबकि फिलहाल अधिकतर डॉक्टर एमआरआई या सीटी स्कैन की जांच पर ही भरोसा कर लेते हैं। 

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भारत में हर साल करीब 10 लाख मरीज

उन्होंने बताया कि डीटीआई तकनीक के जरिए ग्लायोमा ट्यूमर को जानने के लिए 14 हाई ग्रेड ग्लायोमा ट्यूमर ग्रस्त मरीजों को तीन वर्ग में विभाजित कर एक खास अध्ययन किया गया, जिसे जर्नल ऑफ न्यूरो ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। इस दौरान ग्लायोमा ट्यूमर का अंश कॉपर्स कैलोसम (वह हिस्सा जो मस्तिष्क के दो भागों को जोड़ता है) में भी फैला हुआ दिखाई दिया, जो तेजी से मस्तिष्क के दूसरे हिस्से में भी फैल रहा था। इस शोध में 3 टेस्ला एमआरआई तकनीक का इस्तेमाल भी किया गया। 

भारत में हर साल करीब 10 लाख मरीज

स्वास्थ्य से जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल ग्लायोमा ट्यूमर के करीब 10 लाख मामले सामने आते हैं। इनमें से कुछ ही फीसदी मरीजों में ट्यूमर की पहचान समय रहते हो पाती है और उन्हें बचा लिया जाता है। डॉ. पारीक का कहना है कि डीटीआई तकनीक के जरिए ट्यूमर की पहचान जल्द होगी, जिससे उनके इलाज के लिए पूरा वक्त मिल सकेगा।

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