दिग्गज भाजपाइयों की इस साजिश से अनजान हैं मोदी!
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दिल्ली एम्स के सीवीओ संजीव चतुर्वेदी को हटाए जाने के मामले में भाजपा नेताओं की साजिश का खुलासा होने के बाद एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। आरोप है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मामले में गलत रिपोर्ट दी थी।
बताया जा रहा है कि 23 अगस्त को स्वास्थ्य सचिव लव वर्मा ने संजीव मामले की विस्तृत रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी थी, जिसमें कहा गया था कि हरियाणा में अपने कार्यकाल के दौरान वन सेवा अधिकारी के तौर पर संजीव चतुर्वेदी ने कई घोटालों का पर्दाफाश किया था, उन्हें एम्स के सीवीओ पद से हटा दिया गया है।
इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री की डॉ. हर्षवर्धन से फोन पर बातचीत के बाद मामला और विवादों में घिर गया, क्योंकि स्वास्थ्य मंत्री ने पीएम को सही तथ्यों से अनजान रखा। यही नहीं, भाजपा के राज्यसभा सांसद की भूमिका के बारे में भी चुप्पी साध ली और मोदी को इस बात की भनक तक नहीं लगने दी।
गलती सुधारने के चक्कर में बुरे फंसे!
ईटी के अनुसार, मोदी सरकार के आने के तीन महीने बाद ही सीवीओ संजीव चतुर्वेदी को पद से हटाए जाने के मामले को हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की तर्ज पर देखा जा रहा है, जिन्होंने हरियाणा में एक के बाद एक कई भ्रष्टाचार के मामले उजागर किए थे इस वजह से उनका बार-बार तबादला किया जा रहा था।
पीएम को दी गई जानकारी में यह कहा गया कि एम्स में सीवीओ जैसा पद रखने के लिए सीवीसी से कोई अनुमति नहीं ली गई। इसकी जगह पर एम्स में डिप्टी सेक्रेटरी/डायरेक्टर का पद बनाया गया था। संजीव चतुर्वेदी के सीवीओ नियुक्त होने से पहले एम्स के डिप्टी डायरेक्टर विनीत चौधरी यह कार्य देख रहे थे।
पीएमओ को लिखे पत्र में वर्मा ने इस फैसले को गलत बताया है। उनके मुताबिक, संजीव चतुर्वेदी को एम्स के सीवीओ के तौर पर नियुक्त करना सीवीसी के नियमों के मुताबिक नहीं था।
उन्होंने कहा कि लंबे समय से चली आ रही इस खामी को अब सुधार लिया गया है। इसी के चलते संजीव को पद से हटाया गया क्योंकि उनके पास सीवीओ का अतिरिक्त कार्यभार था।
ऐसे खुली पूरे मामले की पोल
हालांकि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, स्वास्थ्य सचिव की ओर से प्रधानमंत्री के प्रधान सचिवों पीके मिश्रा और नृपेंद्र मिश्रा को भेजी गई रिपोर्ट में मामले की आधी-अधूरी जानकारी दी गई थी।
वर्मा कह ओर से भेजी गई रिपोर्ट के तुरंत बाद सवास्थ्य मंत्रालय के सीवीओ विश्वास मेहता ने इस बात का खंडन किया था कि संजीव की नियुक्ति में सीवीसी की गाइडलाइंस का उल्लंघन किया गया था।
अक्तूबर 2012 की एक फाइल के हवाले से मेहता ने बताया कि सीवीओ की नियुक्ति के मामले में सीवीसी से अनुमति लेने और उसकी गाइडलाइंस को मानने के लिए निर्धारित संस्थाओं की सूची में एम्स का नाम नहीं है। यानी संजीव की नियुक्ति को सीवीसी की ओर गलत ठहराने का स्वास्थ्य मंत्री का बयान पूरी तरह निराधार था।
मेहता ने यह भी कहा कि 23 मई 2014 को जारी की गई फाइल में सभी संवैधानिक आवश्यकताओं को पूरा कर लिया गया था और सीवीओ की नियुक्ति भी की जा चुकी थी, ऐसे में यह मामला खुद ब खुद बंद हो जाता है।
कौन सबसे बड़ा 'खिलाड़ी'?
मेहता की ओर से दिए गए इन तथ्यों ने स्वास्थ्य सचिव की ओर से जारी की गई रिपोर्ट को पूरी तरह गलत करार दिया। वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि संजीव चतुर्वेदी को एम्स में उनके कामों के अलावा सीवीओ का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था, जबकि संजीव की नियुक्ति में एम्स के ज्ञापन में इस बात का जिक्र है कि सीवीओ के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों के अलावा वह एम्स के चार अन्य कार्यों को भी देखेंगे।
मेहता ने यह भी बताया कि तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव एसएच. प्रधान ने 8 जून 2012 को पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने प्रतिबद्घता जताते हुए कहा था कि संजीव चतुर्वेदी को एम्स का सीवीओ नियुक्त किया जाएगा।
वर्तमान स्वास्थ्य सचिव की रिपोर्ट में पीएमओ को इस बात से भी अनजान रखा गया कि संजीव को पद से हटाने के मामले में भाजपा सांसद जेपी नड्डा की अहम भूमिका है। हिमाचल से राज्यसभा सांसद नड्डा ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद को भी चिट्ठी लिखकर चतुर्वेदी को पद से हटाने की मांग की थी।
ये थी भाजपा नेता की ख्वाहिश
24 जून को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को लिखी गई एक खुली चिट्ठी में नड्डा ने संजीव चतुर्वेदी को पद से हटाने की मांग करते हुए एम्स के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के प्रमुख विनोद कौल को नया सीवीओ नियुक्त करने को कहा था।
उन्होंने यह भी कहा था कि संजीव को उनकी मूल काडर में वापस भेज दिया जाए साथ ही उनकी ओर से शुरू की गई सभी जांचों पर रोक लगा दी जाए। बता दें कि संजीव चतुर्वेदी अभी भी एम्स में कार्यरत हैं लेकिन उनसे सीवीओ के तौर पर सभी जिम्मेदारियां वापस ले ली गई हैं।
मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि संजीव की भूमिका पूरी तरह शून्य हो चुकी है। हरियाणा में वन विभाग अधिकारी के तौर पर उन्होंने हुड्डा सरकार के कई घोटालों को उजागर किया था जिसके कारण उन पर लगातार हमले होते रहे।
एम्स में भी उन्होंने अपने काम की यही धुन बरकरार रखी और हॉस्पिटल के कई सीनियर अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू करवा दी। इसके बाद उठे तूफान से उनका तबादला करने की कोशिश की गई लेकिन सिविल सर्विस बोर्ड और स्वास्थ्य व परिवार कल्याण पार्लियामेंट्री कमेटी की ओर से विरोध दर्ज कराए जाने के बाद मामला ठंडा पड़ गया।