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बुखारी बोले नजमा हेपतुल्ला पर हो रहा उम्र का असर

Sun, 16 Nov 2014 03:54 PM IST
Updated Sun, 16 Nov 2014 03:54 PM IST
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Najma heptulla slams bukhari for son anointment, bukhari calls her senile.

दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमा अहमद बुखारी के अपने बेटे शाबान बुखारी को नाइब इमाम बनाने का फैसला एक बार विवादों से घिर गया है।

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शाही इमाम बुखारी के इस फैसले पर सवाल खड़े करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने कहा है कि वक्फ बोर्ड के अंतर्गत पिता के पद को बेटे को दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है।

नजमा ने बुखारी के इस फैसले को बिल्कुल गलत बताया है। नजमा के इस हमले का जवाब देते हुए बुखारी ने कहा कि मंत्री जी अब बूढ़ी हो गई हैं।

अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में हेपतुल्ला ने कहा कि यह सच है कि वक्फ कानून में ऐसा कुछ नहीं है जो इमामों की पारिवारिक नियुक्ति पर रोक लगाए। कानून में कहा गया है कि ये प्रदेश वक्फ बोर्ड का अधिकार है कि वह किसे मस्जिद का इमाम बनाए। इमाम को भी उसकी सैलरी बोर्ड ही देता है।
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नजमा ने कहा कि वह दिल्ली के पूर्व सांसद और बोर्ड के पूर्व चेयरमैन मतीन अहमद से इस बारे में बात करेंगी। नजमा ने बताया कि देशभर के मौलवियों की एक बैठक बुलाई गई है। अब देखना है कि क्या वहां यह मुद्दा कोई उठाता है।

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नजमा के साथ ही मतीन भी हुए बुखारी के खिलाफ

Najma heptulla slams bukhari for son anointment, bukhari calls her senile.

जब बुखारी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि नजमा हेपतुल्ला की कही गई बातों पर उन्हें कोई प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। वह जो भी बात करना चाहती हैं उन्हें करने दी जाए।

नजमा पर उम्र का असर हो रहा है। अब समय आ गया है कि वह घर पर ही रहें। बुखारी के परिवार ने बताया कि परिवार के किसी सदस्य को इमाम बनाने की प्रथा 14 पीढियों से चली आ रही है।

अहमद मतीन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि शाबान बुखारी के नइब इमाम बनने को लेकर प्रदेश बोर्ड से कोई अनुमति नहीं ली गई है पर वक्फ कानून में इस पर कोई रोक नहीं है।

अहमद ने बताया कि वक्फ कानून में ऐसी नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है और वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन होने के नाते उन्हें भी इस नियुक्ति से ऐतराज है। इसलिए अहमद ने 22 नवंबर को शाबान की होने वाली ताजपोशी से किनारा करने का मन बनाया है।

पिता द्वारा बेटे को नियुक्त करना कहीं भी वर्णित नहीं है पर सच कहा जाए तो कोई कानून इस पर रोक भी नहीं लगाता है। शाही इमाम को ऐसी नियुक्ति से पहले किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन अहमद इस बात से सहमत नहीं हैं इसलिए उन्होंने ताजपोशी के कार्यक्रम में ना जाने का फैसला किया है।

अपनी जिद पर अड़े हैं बुखारी

Najma heptulla slams bukhari for son anointment, bukhari calls her senile.

बुखारी का अपने बेटे शाबान बुखारी को नाइब इमाम बनाने का पूरा मामला इसलिए विवादों में है क्योंकि जामा मस्जिद का वक्फ की संपत्ति होने का मामला बहुत ही पुराना और उलझा हुआ है।

यह मामला पहली बार तब उठा था जब अहमद बुखारी को उनके पिता ने 1973 में अपने नइब इमाम के रूप में नामित किया था। हालांकि बुखारी हमेशा इसके लिए लड़ते आए हैं जबकि दिल्ली वक्फ बोर्ड का रिकॉर्ड कहता है कि जामा मस्जिद वक्फ की संपत्ति है।

इससे पहले बुखारी 22 नवंबर के आयोजन के दिन पीएम मोदी के बजाए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को न्यौता देने के लिए विवादों में आए थे। इस बात पर कई मुस्लिमों ने भी बुखारी का विरोध किया था पर बुखारी अपने फैसले पर कायम रहे।

बुखारी का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि उन्हें मोदी को बुलाने की जरूरत है क्योंकि पीएम बनने के बाद उनका मुस्लिमों से कोई वास्ता नहीं रह गया है।

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