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Delhi: एनसीआर समेत हरियाणा के यमुनानगर में खनन माफिया का खुला खेल, एनजीटी में दाखिल रिपोर्ट में पुष्टि

Fri, 02 Jan 2026 03:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 02 Jan 2026 03:46 AM IST
सार

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश अधिग्रहीत सैटेलाइट और ड्रोन तस्वीरें, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्टें और राज्य स्तरीय जांच दस्तावेज यह साबित करते हैं कि रेत, बजरी और पत्थर का अवैध दोहन वर्षों से संगठित नेटवर्क के तहत चल रहा है।

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Mining mafia operating openly in Yamunanagar, Haryana, including the NCR region
एनजीटी - फोटो : संवाद

विस्तार

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) से लेकर एनसीआर से सटे हरियाणा के यमुनानगर तक अवैध खनन अब कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं रह गई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश अधिग्रहीत सैटेलाइट और ड्रोन तस्वीरें, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्टें और राज्य स्तरीय जांच दस्तावेज यह साबित करते हैं कि रेत, बजरी और पत्थर का अवैध दोहन वर्षों से संगठित नेटवर्क के तहत चल रहा है।

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सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, आदेश जारी हुए लेकिन खनन माफिया हर दौर में आबाद रहा। यह कहानी केवल अवैध खनन की नहीं बल्कि नेता- अधिकारी- माफिया गठजोड़, संस्थागत विफलता और उस व्यवस्था की है, जहां कानून से पहले पैसा चलता है। सीएजी की हरियाणा और उत्तर प्रदेश से जुड़ी ऑडिट रिपोर्टों में बार-बार दर्ज है कि अवैध खनन कोई एक-दो साल की समस्या नहीं, बल्कि दशकों से चलती आ रही एक संरचनात्मक विफलता है।
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इन रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि खनन पट्टों की शर्तों, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और रॉयल्टी संग्रह में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आती रही हैं, लेकिन उन पर स्थायी और निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी। एनजीटी ने अलग-अलग मामलों में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यमुना नदी, अरावली और शिवालिक क्षेत्र में अवैध खनन चेतावनियों और प्रतिबंधों के बावजूद जारी रहा, जो यह दर्शाता है कि समस्या केवल नियमों की नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति की भी है। 
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एनजीटी में दाखिल हलफनामों के साथ प्रस्तुत इसरो-आधारित सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन फुटेज में एनसीआर के कई हिस्सों में यमुना के खादर क्षेत्र की बदली हुई भौगोलिक संरचना साफ दिखाई देती है। इन तस्वीरों में नदी किनारे बने अवैध रैंप, भारी मशीनों के निशान और असामान्य गड्ढे दर्ज हैं, जो खनन की तीव्रता और निरंतरता को उजागर करते हैं। एनजीटी ने इन दृश्य प्रमाणों को गंभीरता से लेते हुए यह टिप्पणी की है कि इतनी व्यापक गतिविधि प्रशासनिक जानकारी और मौन सहमति के बिना संभव नहीं हो सकती।

हजारों करोड़ का खेल
सीएजी, राज्य खनन विभाग के आंतरिक आकलनों और खनन नीति से जुड़े पूर्व अधिकारियों के अनुमानों के अनुसार, पूरे एनसीआर क्षेत्र में अवैध खनन से हर साल लगभग 6,000 से 8,000 करोड़ रुपए का गैरकानूनी कारोबार होता है। यदि इसमें कर चोरी, रॉयल्टी अपवंचन और वास्तविक बाजार मूल्य के अंतर को जोड़ा जाए, तो यह आंकड़ा और भी अधिक हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर का विशाल निर्माण उद्योग इस अवैध सप्लाई चेन को लगातार मांग उपलब्ध कराता है, जिससे यह कारोबार थमता नहीं।

प्रशासनिक विफलता -आदेश हैं, कार्रवाई नहीं
एनसीआर और यमुनानगर दोनों ही क्षेत्रों में सैटेलाइट डेटा, ड्रोन फुटेज और एनजीटी के स्पष्ट आदेश मौजूद होने के बावजूद जमीनी कार्रवाई सीमित रही है। जब्ती और एफआईआर की संख्या, अवैध खनन के वास्तविक पैमाने के अनुपात में बेहद कम है।


एनसीआर से सटा यमुनानगर बैक-एंड सप्लाई जोन 
यमुनानगर भले ही औपचारिक रूप से एनसीआर का हिस्सा न हो, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे खनन माफिया के लिए एक आदर्श बैक-एंड क्षेत्र बनाती है। यमुना का ऊपरी प्रवाह और शिवालिक क्षेत्र से सटे इलाकों में रेत, बजरी और पत्थर की उपलब्धता के कारण यहां खनन गतिविधियां तेज होती गईं। राज्य खनन विभाग और विजिलेंस से जुड़े आकलनों के अनुसार, यमुनानगर और आसपास के क्षेत्रों में हर साल 800 से 1,200 करोड़ रुपए का अवैध खनन कारोबार होता है, जिसकी सामग्री बड़े पैमाने पर एनसीआर के निर्माण प्रोजेक्ट्स तक पहुंचती है।

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